सेहत का सच्चा साथी कौन? एल्यूमिनियम या कॉपर
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Wellness
कॉपर के बर्तन: एंटी-बैक्टीरियल और स्वास्थ्यवर्धक.
एल्यूमिनियम: सीमित और सावधानीपूर्वक उपयोग करें.
संतुलित और सही प्रयोग से सुरक्षित रसोई.
Nagpur / आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में हम खाने की गुणवत्ता पर तो चर्चा करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि जिस बर्तन में खाना पकता है, उसका सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है। रसोई में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली दो धातुएं हैं। एल्यूमिनियम और कॉपर। एल्यूमिनियम हल्का, सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने के कारण लगभग हर घर में मिल जाता है। प्रेशर कुकर से लेकर कढ़ाही और फॉयल तक, इसका उपयोग व्यापक है। लेकिन स्वास्थ्य के नजरिए से एल्यूमिनियम को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो एल्यूमिनियम शरीर के लिए आवश्यक तत्व नहीं है। जब इसमें खट्टा, नमकीन या अधिक मसालेदार भोजन पकाया जाता है, तो बर्तन की सतह से एल्यूमिनियम के कण भोजन में घुल सकते हैं। लंबे समय तक ऐसा भोजन करने से ये कण शरीर में जमा हो सकते हैं। कुछ शोधों में यह बात सामने आई है कि एल्यूमिनियम का अत्यधिक संपर्क मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों से इसके संभावित संबंध पर भले ही अभी पूर्ण सहमति न हो, लेकिन यह जरूर माना जाता है कि किडनी की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए एल्यूमिनियम अधिक जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि शरीर से इसे बाहर निकालना उनके लिए कठिन हो जाता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ एल्यूमिनियम के बर्तनों के सीमित उपयोग और उनमें खाना पकाते समय अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।
इसके विपरीत, कॉपर यानी तांबा भारतीय परंपरा और आयुर्वेद में सदियों से सेहत का प्रतीक माना गया है। तांबे के बर्तन में पानी रखने और पीने की परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी रखती है। तांबा प्राकृतिक रूप से एंटी-बैक्टीरियल गुणों से भरपूर होता है, जिससे पानी में मौजूद हानिकारक सूक्ष्म जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार तांबा मानव शरीर के लिए आवश्यक सूक्ष्म खनिज है, जो हीमोग्लोबिन के निर्माण, आयरन के अवशोषण, इम्यून सिस्टम को मजबूत करने और हड्डियों की मजबूती में अहम भूमिका निभाता है। नियमित रूप से सीमित मात्रा में तांबे के संपर्क से पाचन तंत्र बेहतर होता है और शरीर की मेटाबॉलिक क्रियाएं संतुलित रहती हैं। सुबह खाली पेट तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से पेट संबंधी समस्याओं में लाभ मिलने की बात भी कही जाती है। हालांकि, यहां संतुलन बेहद जरूरी है। जरूरत से ज्यादा तांबा शरीर में पहुंच जाए तो यह फायदे की जगह नुकसान कर सकता है। अधिक मात्रा में तांबा लेने से मतली, उल्टी, पेट दर्द और यहां तक कि लिवर पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए तांबे के बर्तनों का उपयोग समझदारी से करना आवश्यक है। पानी रखने या भोजन परोसने तक इसका प्रयोग सुरक्षित माना जाता है, जबकि रोज़ाना खाना पकाने के लिए टिन या स्टील कोटेड तांबे के बर्तन ही उपयुक्त होते हैं।
यदि एल्यूमिनियम और कॉपर की तुलना पूरी ईमानदारी से की जाए, तो सेहत के लिहाज़ से कॉपर को स्पष्ट बढ़त मिलती है, लेकिन शर्त यह है कि उसका उपयोग सही तरीके और सीमित मात्रा में हो। एल्यूमिनियम जहां सुविधाजनक और किफायती है, वहीं इसका अत्यधिक और लापरवाह उपयोग दीर्घकालीन स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, तांबा शरीर की जरूरत भी है और सही मात्रा में इस्तेमाल होने पर यह लाभकारी सिद्ध होता है। आधुनिक समय में स्टेनलेस स्टील जैसे सुरक्षित विकल्प भी मौजूद हैं, जो इन दोनों धातुओं की कमियों को काफी हद तक संतुलित कर देते हैं। फिर भी, यदि सवाल केवल एल्यूमिनियम बनाम कॉपर का हो, तो स्वास्थ्य की कसौटी पर कॉपर अधिक भरोसेमंद दिखाई देता है। अंततः, यह समझना जरूरी है कि कोई भी धातु पूरी तरह अच्छी या बुरी नहीं होती। असल फर्क उसके उपयोग के तरीके, मात्रा और हमारी जागरूकता से पड़ता है। सही जानकारी और संतुलित प्रयोग ही रसोई को सचमुच सेहतमंद बना सकता है।