पुरुषों में बढ़ता ब्रेस्ट कैंसर: देर से पहचान, इलाज में देरी और बढ़ती चुनौती

Wed 07-Jan-2026,01:15 AM IST +05:30

ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |

Follow Us

पुरुषों में बढ़ता ब्रेस्ट कैंसर: देर से पहचान, इलाज में देरी और बढ़ती चुनौती Men's-Breast-Cancer
  • पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर की पहचान अक्सर देर से होती है.

  • शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना बड़ी चुनौती.

  • समय पर जांच से इलाज अधिक सफल हो सकता है.

Maharashtra / Nagpur :

नागपुर/ अब तक ब्रेस्ट कैंसर को महिलाओं से जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन बदलती जीवनशैली और जागरूकता की कमी के बीच यह रोग पुरुषों को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर के मामले कम जरूर हैं, लेकिन समस्या यह है कि अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है। यही कारण है कि इलाज जटिल हो जाता है और मरीजों को अधिक शारीरिक व मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर आमतौर पर 50 से 70 वर्ष की आयु के बीच सामने आता है। शुरुआती लक्षणों को अक्सर मामूली समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। छाती में गांठ, निप्पल से असामान्य स्राव, त्वचा में बदलाव या दर्द जैसे संकेतों को पुरुष गंभीरता से नहीं लेते। समाज में यह धारणा भी गहराई से बैठी हुई है कि ब्रेस्ट कैंसर केवल महिलाओं की बीमारी है, जिससे पुरुषों में जांच और इलाज को लेकर झिझक बनी रहती है।

अस्पतालों में सामने आ रहे मामलों में यह स्पष्ट देखा जा रहा है कि बड़ी संख्या में पुरुष मरीज थर्ड या फोर्थ स्टेज में इलाज के लिए पहुंचते हैं। इस स्तर पर कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों तक फैल चुका होता है, जिससे सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी जैसे इलाज लंबे और कठिन हो जाते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यदि समय रहते जांच हो जाए तो ब्रेस्ट कैंसर का इलाज काफी हद तक सफल हो सकता है, लेकिन देरी इसकी सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।

चिकित्सा आंकड़ों के अनुसार हर साल सैकड़ों नए मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें पुरुषों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि हार्मोनल असंतुलन, मोटापा, धूम्रपान, शराब सेवन, पारिवारिक इतिहास और बढ़ती उम्र इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। इसके अलावा जिन पुरुषों में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर अधिक होता है, उनमें ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। लिवर की बीमारियां और कुछ दवाइयों का लंबे समय तक सेवन भी जोखिम को बढ़ाने वाले कारणों में शामिल हैं।

इलाज की प्रक्रिया महिलाओं के समान ही होती है, लेकिन पुरुषों में जागरूकता की कमी के कारण मानसिक दबाव अधिक देखने को मिलता है। कई मरीज सामाजिक शर्म और डर के कारण अपनी बीमारी को छिपाते हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पुरुषों को यह समझने की जरूरत है कि ब्रेस्ट कैंसर लिंग से नहीं, बल्कि शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव से जुड़ी बीमारी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि नियमित स्वास्थ्य जांच पुरुषों के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी महिलाओं के लिए। खासतौर पर जिन पुरुषों के परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास रहा हो, उन्हें समय-समय पर जांच करानी चाहिए। छाती में किसी भी तरह की गांठ या असामान्य बदलाव दिखे तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। शुरुआती चरण में पहचान होने पर इलाज अपेक्षाकृत सरल और प्रभावी होता है।

सरकारी और निजी स्तर पर जागरूकता अभियानों की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है। अधिकतर कैंसर जागरूकता कार्यक्रम महिलाओं पर केंद्रित रहते हैं, जबकि पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर पर चर्चा बहुत कम होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मीडिया, स्वास्थ्य संस्थान और समाज मिलकर इस विषय पर खुलकर बात करें, तो पुरुषों में डर और भ्रांति दोनों कम हो सकती हैं।

आज आवश्यकता है कि पुरुषों को अपनी सेहत के प्रति सजग बनाया जाए और यह संदेश दिया जाए कि किसी भी बीमारी को छिपाना समाधान नहीं है। ब्रेस्ट कैंसर चाहे महिला हो या पुरुष, समय पर पहचान और सही इलाज ही जीवन को बचा सकता है। बदलते समय में यह जरूरी हो गया है कि पुरुष भी नियमित जांच, संतुलित जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। तभी इस गंभीर बीमारी से प्रभावी तरीके से मुकाबला किया जा सकता है।