एचआईवी पीड़ित मां की मौत, समाज की बेरुखी के बीच आख़िरी सांस तक लड़ता रहा नाबालिग बेटा
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HIV Patient Death
एचआईवी पीड़ित महिला की इलाज के अभाव में मौत, समाज ने बनाई दूरी.
नाबालिग बेटा बना मां का एकमात्र सहारा, मदद के लिए भटकता रहा.
प्रशासन के हस्तक्षेप से अंतिम संस्कार, बच्चा एचआईवी निगेटिव पाया गया.
Delhi / एटा. इलाके में एक हृदयविदारक घटना सामने आई है, जहां एचआईवी संक्रमण से पीड़ित महिला ने इलाज और मानवीय सहयोग के अभाव में दम तोड़ दिया। महिला के पति की मौत भी एक साल पहले इसी बीमारी के कारण हो चुकी थी, जिसके बाद से वह अपने नाबालिग बेटे के साथ अकेली रह रही थी। बीमारी की जानकारी सामने आने के बाद परिवार, रिश्तेदार और गांव के लोग उससे दूरी बनाते चले गए। हालात इतने बिगड़ गए कि जरूरत के समय कोई उसके पास फटकने तक को तैयार नहीं हुआ। बीते कई दिनों से महिला गंभीर हालत में बिस्तर पर पड़ी थी, लेकिन पांच दिनों तक कोई परिजन या जान-पहचान का व्यक्ति उसे देखने नहीं आया। बीमारी के डर और सामाजिक भ्रम के कारण महिला को पानी, भोजन और दवाइयों तक के लिए जूझना पड़ा।
इस कठिन समय में महिला का करीब दस वर्षीय बेटा ही उसका एकमात्र सहारा बना रहा। मां की सेवा, घर का काम और मदद की तलाश सब कुछ उसी नन्हे कंधे पर आ गया। वह मां को बचाने के लिए आसपास मदद मांगता रहा, लेकिन हर जगह से निराशा ही हाथ लगी। हालत बिगड़ने पर उसने मां को इलाज के लिए बाहर ले जाने की कोशिश की, मगर संसाधनों की कमी और देर से मिली मदद के कारण महिला की जान नहीं बच सकी। मां की मौत के बाद भी संवेदनहीनता की तस्वीर सामने आई, जब अंतिम संस्कार के लिए भी गांव से कोई आगे नहीं आया। सूचना मिलने पर प्रशासन और पुलिस ने हस्तक्षेप कर पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी कराई।
घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने बच्चे की मेडिकल जांच कराई, जिसमें वह एचआईवी निगेटिव पाया गया, जो राहत की बात है। प्रशासन ने बच्चे की देखभाल और भविष्य को लेकर संरक्षण, शिक्षा और आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। यह मामला केवल एक महिला की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में आज भी एचआईवी जैसी बीमारियों को लेकर फैली गलत धारणाओं और अमानवीय सोच को उजागर करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि एचआईवी छुआछूत की बीमारी नहीं है और सही इलाज से संक्रमित व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है, लेकिन डर और बहिष्कार कई बार बीमारी से पहले इंसान की जान ले लेता है। यह घटना समाज और व्यवस्था दोनों के लिए एक कठोर चेतावनी है कि संवेदना और जागरूकता के बिना किसी भी बीमारी से लड़ाई अधूरी है।