AIIMS भोपाल से SCI तक: 4 वर्षीय बालक ने हाई-रिस्क न्यूरोब्लास्टोमा पर पाई जीत, सफल BMT के बाद घर वापसी
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Cancer Success Story
हाई-रिस्क न्यूरोब्लास्टोमा से पीड़ित 4 वर्षीय बालक स्वस्थ.
ऑटोलॉगस बोन मैरो ट्रांसप्लांट से मिला नया जीवन.
डॉक्टरों की टीम और आधुनिक चिकित्सा की बड़ी सफलता.
Jabalpur / हजारों रोगियों और उनके परिवारों के लिए उम्मीद की एक नई रोशनी बनकर सामने आई है चार वर्षीय एक मासूम बच्चे की यह प्रेरक कहानी, जिसने लंबी और कठिन चिकित्सा प्रक्रिया के बाद आखिरकार स्वस्थ होकर अपने घर वापसी की। यह कहानी न सिर्फ आधुनिक चिकित्सा की ताकत को दर्शाती है, बल्कि डॉक्टरों की मेहनत, नर्सिंग स्टाफ की संवेदनशीलता और परिवार के अटूट धैर्य की भी मिसाल पेश करती है।
यह बच्चा हाई-रिस्क मेटास्टैटिक न्यूरोब्लास्टोमा जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी से जूझ रहा था। शुरुआत में उसका इलाज एम्स भोपाल में चल रहा था, लेकिन आगे के उन्नत उपचार के लिए उसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल स्थित राज्य कैंसर संस्थान (SCI) में स्थानांतरित किया गया। यहीं से उसके इलाज का वह निर्णायक चरण शुरू हुआ, जिसने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. श्वेता पाठक के अनुसार, बच्चे को 8 दिसंबर 2025 को बीएमटी (बोन मैरो ट्रांसप्लांट) यूनिट में भर्ती किया गया था। जांच और तैयारी के बाद डॉक्टरों की टीम ने इलाज के लिए ऑटोलॉगस बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) का निर्णय लिया, जो बच्चों में कैंसर के इलाज की एक बेहद जटिल और संवेदनशील प्रक्रिया मानी जाती है। इस दौरान बच्चे के शरीर से लगभग 100 मिलीलीटर CD 34+ स्टेम सेल सावधानीपूर्वक निकाले गए, ताकि आगे चलकर हेमेटोलॉजिकल रिकवरी सुनिश्चित की जा सके।
इस पूरी प्रक्रिया को डीन प्रोफेसर डॉ. नवनीत सक्सेना, एससीआई अधीक्षक डॉ. लक्ष्मी सिंगोटिया, अस्पताल अधीक्षक डॉ. अरविंद शर्मा और बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. मोनिका के कुशल प्रशासनिक और चिकित्सकीय मार्गदर्शन में अंजाम दिया गया। हर कदम पर सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण और बच्चे की स्थिति पर बारीकी से नजर रखी गई।
इलाज का सबसे चुनौतीपूर्ण चरण था हाई-डोज कीमोथेरेपी, जिसका उद्देश्य शरीर में मौजूद कैंसर की बची हुई कोशिकाओं को पूरी तरह खत्म करना था। यह चरण बच्चे के लिए बेहद कठिन था और इसमें लगातार निगरानी की जरूरत पड़ी। कीमोथेरेपी के बाद करीब 72 घंटे तक सख्त ऑब्जर्वेशन में रखने के बाद पहले से संग्रहित स्टेम सेल को बच्चे के शरीर में दोबारा प्रत्यारोपित किया गया।
इस नाजुक दौर में डॉ. महोबिया, डॉ. राजेश जैन, डॉ. विद्या और डॉ. मीणा की टीम ने प्रतिरक्षा प्रणाली की बहाली पर लगातार नजर बनाए रखी। वहीं डॉ. नरेंद्र पटेल और एनेस्थीसिया टीम ने तकनीकी स्थिरता सुनिश्चित की। साइटोपेनिक अवधि के दौरान आवश्यक रक्त सहायता और हेमेटोलॉजिकल प्रबंधन की जिम्मेदारी डॉ. बी.एस. यादव ने संभाली।
पूरे उपचार के दौरान सीनियर रेजिडेंट्स, नर्सिंग स्टाफ और लैब तकनीशियनों ने दिन-रात बच्चे की देखभाल की। उनकी सतर्कता, संवेदनशीलता और समर्पण के बिना यह सफलता संभव नहीं थी।
अंततः, जब बच्चे को पूरी तरह स्थिर और स्वस्थ घोषित कर अस्पताल से छुट्टी दी गई, तो वह पल सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे चिकित्सा समुदाय के लिए गर्व और संतोष का क्षण था। यह सफलता हजारों कैंसर पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों के लिए यह संदेश देती है कि सही इलाज, मजबूत इच्छाशक्ति और विशेषज्ञों की मेहनत से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।