अल्सरेटिव कोलाइटिस: आंतों की एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली बीमारी

Thu 08-Jan-2026,01:39 AM IST +05:30

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अल्सरेटिव कोलाइटिस: आंतों की एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली बीमारी Digestive Health
  • बार-बार दस्त और पेट में जलन अल्सरेटिव कोलाइटिस के संकेत.

  • आंतों की सूजन और अल्सर से खून आने की संभावना.

  • संतुलित आहार और चिकित्सक की सलाह से रोग नियंत्रित.

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / बार-बार दस्त आना, पेट में जलन या मरोड़, मल में खून दिखना, अचानक शौच की तीव्र इच्छा और लगातार थकान जैसे लक्षण आमतौर पर लोग हल्की पेट की समस्या, गैस या संक्रमण मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि ये संकेत अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी गंभीर बीमारी के हो सकते हैं। अल्सरेटिव कोलाइटिस एक दीर्घकालिक सूजन संबंधी रोग है, जो मुख्य रूप से बड़ी आंत यानी कोलन और मलाशय को प्रभावित करता है। इस बीमारी में आंतों की अंदरूनी परत पर सूजन आ जाती है और धीरे-धीरे छोटे-छोटे घाव बन जाते हैं, जिन्हें अल्सर कहा जाता है। इन घावों के कारण आंतों से खून और मवाद निकल सकता है, जिससे रोगी को बार-बार दस्त, कमजोरी और एनीमिया जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और यदि समय रहते इसका सही इलाज न किया जाए तो यह व्यक्ति की जीवनशैली, कार्यक्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकती है। चिकित्सकों के अनुसार, लंबे समय तक बनी रहने वाली आंतों की सूजन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को भी प्रभावित करती है, जिससे रोगी को बार-बार थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होने लगती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अल्सरेटिव कोलाइटिस के पीछे मुख्य कारण शरीर की ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया हो सकती है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी ही आंतों पर हमला करने लगती है। इसके अलावा अनियमित खानपान, अत्यधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन, जंक फूड का अधिक सेवन, मानसिक तनाव, चिंता, नींद की कमी, एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग और आंतों में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया का असंतुलन भी इस बीमारी को बढ़ावा दे सकता है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से इस रोग को पित्तज ग्रहणी या रक्तातिसार के रूप में देखा जाता है, जिसमें पित्त दोष के असंतुलन से आंतों की कोमल परत में जलन और सूजन बढ़ जाती है। आयुर्वेद में ऐसे मामलों में शीतल और स्तंभक गुणों वाले आहार और औषधियों की सलाह दी जाती है, ताकि आंतों की सूजन कम हो और पाचन तंत्र को आराम मिले। छाछ, अनार के छिलके का काढ़ा, बेल का फल, मुलेठी और इसबगोल जैसे घरेलू उपायों का उल्लेख पारंपरिक चिकित्सा में मिलता है, हालांकि किसी भी उपाय को अपनाने से पहले चिकित्सकीय सलाह आवश्यक मानी जाती है।

चिकित्सकीय विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि आंत और मस्तिष्क के बीच गहरा संबंध होता है, जिसे गट-ब्रेन एक्सिस कहा जाता है। लगातार तनाव, भावनात्मक दबाव और अवसाद आंतों की सूजन को और बढ़ा सकते हैं, जिससे बीमारी के लक्षण गंभीर हो जाते हैं। लंबे समय तक अनियंत्रित अल्सरेटिव कोलाइटिस रहने पर कोलन कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है, इसलिए नियमित जांच और इलाज बेहद जरूरी है। इस बीमारी में संतुलित और हल्का भोजन, पर्याप्त पानी का सेवन, समय पर नींद, तनाव प्रबंधन और चिकित्सक द्वारा बताई गई दवाओं का नियमित पालन जरूरी माना जाता है। विशेषज्ञ सफेद चीनी, मैदा, अत्यधिक मसाले, चाय-कॉफी और शराब से परहेज की सलाह देते हैं। कुल मिलाकर, अल्सरेटिव कोलाइटिस एक खामोश लेकिन गंभीर बीमारी है, जिसकी समय पर पहचान और सही उपचार से इसके प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और रोगी एक बेहतर जीवन जी सकता है।