प्रेग्नेंसी में बढ़ती शुगर: मां और गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा के लिए क्या करें?
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Pregnancy Sugar (Photo AI)
प्रेग्नेंसी में बढ़ी शुगर मां और बच्चे दोनों को प्रभावित करती है.
सही डाइट, नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह बेहद जरूरी.
समय पर नियंत्रण से जटिलताओं और सी-सेक्शन का खतरा कम.
Nagpur / मां बनना हर दौर में एक बड़ी जिम्मेदारी और चुनौती रहा है, लेकिन आज की बदलती लाइफस्टाइल, देर से शादी, करियर का दबाव और IVF जैसी तकनीकों की बढ़ती जरूरत ने गर्भधारण को और जटिल बना दिया है। ऐसे में प्रेग्नेंसी के दौरान शुगर लेवल का बढ़ना एक आम लेकिन गंभीर समस्या बनती जा रही है। प्रेग्नेंसी में शुगर बढ़ने की स्थिति को Gestational Diabetes Mellitus कहा जाता है, जिसका सीधा असर मां और गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों पर पड़ता है। अच्छी बात यह है कि सही समय पर जांच, संतुलित खानपान, नियमित गतिविधि और डॉक्टर की सलाह से इसे काबू में रखा जा सकता है। आमतौर पर डिलीवरी के कुछ हफ्तों बाद शुगर लेवल सामान्य हो जाता है, लेकिन अगर ऐसा न हो तो आगे चलकर डायबीटीज़ का खतरा बढ़ सकता है।
करीब तीन-चार दशक पहले प्रेग्नेंसी में शुगर के मामले कम देखने को मिलते थे। उस समय महिलाओं की जीवनशैली अधिक सक्रिय थी, खानपान अपेक्षाकृत प्राकृतिक था और मिलावटी या पैक्ड फूड का चलन कम था। आज की स्थिति अलग है। जंक फूड, शारीरिक गतिविधि की कमी और मानसिक तनाव के कारण महिलाओं में PCOS जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं, जिससे हार्मोनल असंतुलन होता है और प्रेग्नेंसी के दौरान शुगर बढ़ने का खतरा रहता है। इसलिए गर्भधारण की योजना बनाने से पहले कुछ जरूरी जांच कराना बेहद अहम हो जाता है, जैसे ब्लड शुगर, थायरॉइड, ब्लड ग्रुप, हीमोग्लोबिन, किडनी और लिवर फंक्शन टेस्ट। इन जांचों से यह पता चल जाता है कि शरीर प्रेग्नेंसी के लिए कितना तैयार है और किन बातों पर पहले से ध्यान देने की जरूरत है।
प्रेग्नेंसी के दौरान शुगर को काबू में रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि इसका असर सामान्य डायबीटीज़ की तुलना में बहुत तेजी से पड़ता है। अगर शुगर लगातार 200 से ऊपर बनी रहे तो मां को हाई ब्लड प्रेशर, बार-बार इंफेक्शन, अत्यधिक वजन बढ़ने और सिज़ेरियन डिलीवरी का खतरा हो सकता है। वहीं गर्भ में पल रहे बच्चे तक भी मां के खून के जरिए ज्यादा शुगर पहुंचती है, जिससे बच्चे का वजन असामान्य रूप से बढ़ सकता है। इस स्थिति को मैक्रोसोमिया कहा जाता है, जिसमें बच्चे का वजन 4 से 4.5 किलो या उससे ज्यादा हो सकता है। ऐसे में नॉर्मल डिलीवरी मुश्किल हो जाती है और सी-सेक्शन की जरूरत पड़ती है। इतना ही नहीं, ऐसे बच्चों की मेटाबॉलिक हेल्थ आगे चलकर प्रभावित हो सकती है।
शुगर को नियंत्रित रखने के लिए प्रेग्नेंसी के दौरान डाइट और एक्सरसाइज़ पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। यह समय सामान्य डायबीटीज़ मरीजों जैसा नहीं होता, क्योंकि यहां हर छोटी लापरवाही बच्चे के विकास पर असर डाल सकती है। डॉक्टर ने जिस तरह दवा या इंसुलिन लेने की सलाह दी हो, उसका नियमित पालन करना चाहिए। हल्की वॉक, डॉक्टर की अनुमति से योग और संतुलित भोजन शुगर को काबू में रखने में मदद करता है। साथ ही पति या पार्टनर और परिवार की भूमिका भी बेहद अहम होती है। सही डाइट तैयार करना, समय पर दवा दिलाना और महिला को मानसिक सहयोग देना केवल उसकी नहीं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी है।
डिलीवरी के बाद ज्यादातर मामलों में शुगर लेवल अपने आप सामान्य हो जाता है, लेकिन 6 से 12 हफ्तों बाद भी अगर शुगर कंट्रोल में न आए तो यह संकेत हो सकता है कि डायबीटीज़ विकसित हो चुकी है। ऐसे में आगे भी नियमित जांच, सही खानपान और सक्रिय जीवनशैली अपनाना जरूरी हो जाता है। सही जानकारी, समय पर इलाज और परिवार के सहयोग से प्रेग्नेंसी के दौरान बढ़ी शुगर को सफलतापूर्वक मैनेज किया जा सकता है और मां व बच्चे दोनों को स्वस्थ रखा जा सकता है।