121 साल पुरानी मेरठ की गजक को मिला GI टैग, अब दुनिया के नक्शे पर दर्ज हुई पारंपरिक मिठास

Thu 08-Jan-2026,10:41 PM IST +05:30

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121 साल पुरानी मेरठ की गजक को मिला GI टैग, अब दुनिया के नक्शे पर दर्ज हुई पारंपरिक मिठास Meerut-Gajak-GI-Tag
  • मेरठ की गजक को मिला GI टैग, नकली उत्पादों पर लगेगी रोक.

  • कारीगरों और व्यापारियों को मिलेगा आर्थिक और कानूनी संरक्षण.

  • घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ेगी गजक की मांग.

Uttar Pradesh / Meerut :

Meerut / उत्तर प्रदेश के मेरठ की पहचान बन चुकी पारंपरिक गजक को जियोग्राफिक इंडिकेशन (GI) टैग मिलना शहर के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। करीब 121 साल पुराने इस पारंपरिक कारोबार को मिली यह मान्यता मेरठ के कारीगरों, व्यापारियों और उन परिवारों के संघर्ष और मेहनत का परिणाम है, जो पीढ़ियों से इस मिठास को सहेजते आ रहे हैं। मेरठ रेवड़ी गजक व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन के लंबे प्रयासों के बाद मिली इस सफलता से अब गजक को न सिर्फ कानूनी सुरक्षा मिली है, बल्कि इसकी वैश्विक पहचान भी सुनिश्चित हो गई है। GI टैग मिलने से मेरठ के नाम पर बनने वाले नकली उत्पादों पर रोक लगेगी, जिससे असली कारीगरों को सीधा लाभ मिलेगा। अनुमान है कि इस उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 10 हजार से अधिक लोग जुड़े हुए हैं, जिनकी आजीविका इसी कारोबार पर निर्भर है। GI टैग के बाद गजक की मांग में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। अब गजक केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि मेरठ की सांस्कृतिक पहचान और विरासत का प्रतीक बन चुकी है, जिसे वैश्विक मंच पर आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है।

मेरठ की गजक की कहानी साल 1904 से शुरू होती है, जब गुदड़ी बाजार में लाला रामचंद्र की दुकान पर तिल और गुड़ के मेल से इस अनोखी मिठाई का जन्म हुआ। कहा जाता है कि शुरुआत में यह एक प्रयोग था, लेकिन इसका स्वाद लोगों को इतना पसंद आया कि जल्द ही यह मेरठ की पहचान बन गई। अंग्रेजी शासन के दौर में अंग्रेज अफसर भी इसके स्वाद के कायल थे और इसे अपने साथ ले जाया करते थे। वर्ष 1915 तक गजक अपने वर्तमान स्वरूप में आ चुकी थी और धीरे-धीरे पूरे देश में इसकी मांग बढ़ने लगी। तिल और गुड़ से बनी गजक सर्दियों में सेहत के लिए भी बेहद लाभकारी मानी जाती है। इसमें इलायची, लौंग, जायफल और जावित्री जैसे मसालों का इस्तेमाल किया जाता है, जो ठंड के मौसम में शरीर को ऊर्जा देने के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं। नवरात्र से लेकर फरवरी तक इसकी बिक्री चरम पर रहती है। समय के साथ गजक ने खुद को आधुनिक स्वाद के अनुसार भी ढाला है। पहले जहां केवल गुड़ की रेवड़ी और साधारण गजक ही मिलती थी, वहीं आज पट्टी गजक, स्प्रिंग रोल गजक, चॉकलेट रोल गजक और ड्राई फ्रूट समोसा गजक जैसे कई नए और आकर्षक रूप बाजार में उपलब्ध हैं। पारंपरिक स्वाद और आधुनिक प्रयोगों के इस मेल ने गजक को नई पीढ़ी के बीच भी लोकप्रिय बना दिया है। वर्तमान में मेरठ की गजक 18 से अधिक देशों तक पहुंच चुकी है और GI टैग मिलने के बाद इसके निर्यात में और तेजी आने की संभावना है। इस उपलब्धि ने ‘वोकल फॉर लोकल’ को नई ताकत दी है और यह साबित किया है कि पारंपरिक भारतीय उत्पाद भी वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। GI टैग के साथ मेरठ की यह मिठास अब सिर्फ ज़ुबान पर नहीं, बल्कि दुनिया के नक्शे पर भी अपनी स्थायी पहचान दर्ज करा चुकी है।