दिमाग की बीमारी या गलतफहमी: साइकोसिस और न्यूरोसिस पर एक नजर
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Mental-Health
साइकोसिस और न्यूरोसिस में वास्तविकता की समझ का बड़ा अंतर.
लक्षणों के अनुसार अलग-अलग इलाज और उपचार पद्धति.
समय पर पहचान से मरीज और परिवार को राहत.
AGCNN / मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद आज भी कई बीमारियां ऐसी हैं, जिन्हें लेकर समाज में भ्रम, डर और चुप्पी बनी रहती है। साइकोसिस और न्यूरोसिस ऐसी ही दो मानसिक स्थितियां हैं, जिन्हें अक्सर लोग एक ही बीमारी समझ लेते हैं, जबकि दोनों के लक्षण, प्रभाव और इलाज की प्रकृति अलग-अलग होती है। इन बीमारियों को सही तरीके से समझना न केवल मरीज के लिए, बल्कि परिवार और समाज के लिए भी जरूरी है।
न्यूरोसिस को आम भाषा में मानसिक तनाव से जुड़ी बीमारी कहा जा सकता है। इसमें व्यक्ति वास्तविकता से पूरी तरह अलग नहीं होता, बल्कि वह अपने आसपास की दुनिया को सही ढंग से समझता है, लेकिन उसका मन लगातार डर, चिंता, बेचैनी या अवसाद से घिरा रहता है। अत्यधिक तनाव, पारिवारिक समस्याएं, आर्थिक दबाव, कार्यस्थल की परेशानियां या किसी आघातपूर्ण घटना के कारण न्यूरोसिस विकसित हो सकता है। इसमें एंग्जायटी, फोबिया, ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर और डिप्रेशन जैसी समस्याएं शामिल मानी जाती हैं। न्यूरोसिस से पीड़ित व्यक्ति को अपनी समस्या का एहसास होता है। वह जानता है कि उसका डर या चिंता सामान्य नहीं है, लेकिन फिर भी वह उस पर नियंत्रण नहीं कर पाता। ऐसे लोग रोजमर्रा के काम करते रहते हैं, नौकरी या पढ़ाई भी जारी रखते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर मानसिक संघर्ष से गुजरते रहते हैं। नींद न आना, दिल की धड़कन तेज होना, पसीना आना, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी इसके सामान्य लक्षण हो सकते हैं।
इसके विपरीत साइकोसिस एक अधिक गंभीर मानसिक स्थिति मानी जाती है। इसमें व्यक्ति का वास्तविकता से संपर्क कमजोर पड़ जाता है। वह ऐसी बातें देखने या सुनने लगता है, जो वास्तव में मौजूद नहीं होतीं। भ्रम, वहम, असामान्य विश्वास और व्यवहार में बड़ा बदलाव साइकोसिस के प्रमुख लक्षण होते हैं। कई बार व्यक्ति यह मानने लगता है कि कोई उसे नुकसान पहुंचाने की साजिश कर रहा है या वह किसी विशेष शक्ति से युक्त है।
साइकोसिस में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि मरीज को अक्सर अपनी बीमारी का एहसास नहीं होता। वह अपने विचारों और अनुभवों को पूरी तरह सही मानता है, जिससे इलाज में देरी हो जाती है। इस स्थिति में व्यक्ति का व्यवहार परिवार और समाज के लिए भी चिंता का कारण बन सकता है। गंभीर मामलों में आत्म-नुकसान या दूसरों को नुकसान पहुंचाने का जोखिम भी बढ़ सकता है साइकोसिस के पीछे कई कारण हो सकते हैं। अनुवांशिक कारण, मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियां, नशे का अत्यधिक सेवन, लंबे समय तक गंभीर तनाव या कुछ मानसिक रोग इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। स्किज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर के कुछ चरणों में साइकोसिस के लक्षण दिखाई देते हैं। इसलिए समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी माना जाता है।
इलाज की बात करें तो न्यूरोसिस और साइकोसिस दोनों के उपचार के तरीके अलग होते हैं। न्यूरोसिस में काउंसलिंग, मनोचिकित्सा, तनाव प्रबंधन तकनीकें और जरूरत पड़ने पर दवाइयों का सहारा लिया जाता है। योग, ध्यान और जीवनशैली में सुधार भी इसमें सहायक साबित होते हैं। मरीज को अपनी भावनाओं को समझने और उनसे निपटने के तरीके सिखाए जाते हैं।
साइकोसिस के इलाज में दवाइयों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है। एंटीसाइकोटिक दवाओं के जरिए मरीज के भ्रम और वहम को नियंत्रित किया जाता है। इसके साथ ही परिवार की भूमिका भी अहम होती है, क्योंकि मरीज को नियमित दवा, सुरक्षित माहौल और भावनात्मक सहारा देना जरूरी होता है। कई मामलों में लंबे समय तक इलाज की आवश्यकता पड़ती है।
समाज में इन दोनों बीमारियों को लेकर फैली गलत धारणाएं मरीज की परेशानी को और बढ़ा देती हैं। मानसिक बीमारी को कमजोरी समझना, मरीज को नजरअंदाज करना या उसे शर्म का विषय मानना सबसे बड़ी समस्या है। जबकि सच्चाई यह है कि मानसिक रोग भी शारीरिक रोगों की तरह ही इलाज योग्य हैं, बशर्ते समय पर सही मदद मिल जाए।
आज जरूरत है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलकर बात की जाए। साइकोसिस और न्यूरोसिस को सही तरीके से समझा जाए और मरीजों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई जाए। परिवार, समाज और चिकित्सा व्यवस्था के सहयोग से ही मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों को सामान्य जीवन की ओर लौटने में मदद मिल सकती है। मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है, जितना शारीरिक स्वास्थ्य का, क्योंकि स्वस्थ मन ही स्वस्थ समाज की नींव बनता है।