बारामती उपचुनाव में बड़ा ट्विस्ट: कांग्रेस ने उतारा उम्मीदवार, MVA में बढ़ी दरार!
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Sunetra Pawar News
कांग्रेस ने बारामती से उम्मीदवार उतारा.
सुनेत्रा पवार के सामने मुकाबला तय.
MVA में मतभेद और सियासी हलचल तेज.
Baramati / महाराष्ट्र की सियासत में बारामती विधानसभा सीट एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। इस प्रतिष्ठित सीट पर होने वाले उपचुनाव ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है, खासकर तब जब कांग्रेस ने महाविकास आघाड़ी (एमवीए) के भीतर मतभेदों के बावजूद अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। कांग्रेस ने बारामती से एडवोकेट आकाश विश्वनाथ मोरे को मैदान में उतारकर साफ संकेत दिया है कि वह इस चुनाव को गंभीरता से लड़ना चाहती है।
यह सीट 28 जनवरी को अजित पवार के विमान हादसे में निधन के बाद खाली हुई थी। अजित पवार इस क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे और उन्होंने बारामती से कई बार जीत दर्ज की थी। अब उनकी पत्नी और महाराष्ट्र की मौजूदा डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार इस सीट से चुनाव लड़ रही हैं। ऐसे में यह मुकाबला भावनात्मक और राजनीतिक—दोनों स्तर पर काफी अहम बन गया है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह है कि शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी (शरद गुट) पहले ही सुनेत्रा पवार के खिलाफ उम्मीदवार न उतारने का फैसला कर चुकी थी। यहां तक कि पार्टी की ओर से यह भी अपील की गई थी कि उन्हें निर्विरोध चुना जाए। उद्धव ठाकरे से भी समर्थन की मांग की गई थी, लेकिन कांग्रेस ने इन सभी समीकरणों को दरकिनार करते हुए अपना उम्मीदवार उतार दिया। इससे एमवीए के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
बारामती के साथ-साथ राहुरी विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव होने जा रहा है। दोनों सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होगा, जबकि नामांकन की अंतिम तारीख 6 अप्रैल तय की गई है। सुनेत्रा पवार भी इसी दिन अपना नामांकन दाखिल करने वाली हैं। 9 अप्रैल तक नाम वापस लिए जा सकेंगे। अगर उस दिन तक उनके सामने कोई उम्मीदवार मैदान में रहता है, तो चुनाव होना तय है।
बारामती सीट का राजनीतिक इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है। यहां कांग्रेस को आखिरी बार जीत 1995 में मिली थी, जब अजित पवार ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता था। इसके बाद 1999 से यह सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के कब्जे में रही है। करीब 35 साल बाद इस सीट पर उपचुनाव हो रहा है, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है।
अजित पवार ने इस सीट से कुल आठ बार जीत हासिल की थी—दो बार कांग्रेस से और छह बार एनसीपी से। 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने ही भतीजे युगेंद्र पवार को भारी अंतर से हराया था। वहीं 2019 में उनका मुकाबला बीजेपी के गोपीचंद पडलकर से हुआ था, जिसमें भी उन्होंने जीत दर्ज की थी।
कांग्रेस के मैदान में उतरने से अब बारामती में सीधा मुकाबला होने की संभावना बढ़ गई है। अभी तक विपक्ष की ओर से कोई बड़ा उम्मीदवार नहीं उतारा गया था, जिससे यह माना जा रहा था कि सुनेत्रा पवार निर्विरोध जीत सकती हैं। लेकिन कांग्रेस के इस फैसले ने चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं।
कुल मिलाकर, बारामती उपचुनाव अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह एमवीए के भीतर एकता, रणनीति और भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला मुकाबला बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह चुनाव गठबंधन में दरार और बढ़ाएगा या फिर कोई नया राजनीतिक समीकरण सामने आएगा।