मुस्लिम महिलाओं के बुर्के पर राजनीति: ओवैसी से उठते सवाल और वैश्विक उदाहरण
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Sudhansu Trivedi Speech on Owaisi Statement
कई मुस्लिम देशों की महिला नेताओं ने बुर्का नहीं पहना.
बुर्के को लेकर भारत में बढ़ती राजनीतिक बहस.
महिला स्वतंत्रता बनाम धार्मिक सियासत का सवाल.
Delhi / यह सवाल मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी से है, जो मुस्लिम महिलाओं के पहनावे को लेकर अक्सर सियासी बयान देते रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी महिला को क्या पहनना चाहिए, बल्कि यह है कि क्या धर्म के नाम पर एक ही सोच को सभी पर थोपना सही है। दुनिया के कई मुस्लिम-बहुल देशों पर नज़र डालें तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। बांग्लादेश में बेगम खालिदा जिया और शेख हसीना लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं, लेकिन क्या उन्हें कभी बुर्का पहने देखा गया? पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो भी वैश्विक मंचों पर सक्रिय रहीं, पर उनका पहनावा कभी बुर्के तक सीमित नहीं रहा।
इसी तरह दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया की पूर्व प्रधानमंत्री मेघावती सुकर्णोपुत्री को भी बुर्के में नहीं देखा गया। ये उदाहरण साफ दिखाते हैं कि नेतृत्व, योग्यता और सोच का महिला के पहनावे से कोई सीधा संबंध नहीं है। मुस्लिम समाज के भीतर भी विविधता है और हर देश, हर संस्कृति की अपनी परंपराएं हैं।
अगर पैगंबर मुहम्मद के वंश की बात करें, तो उनके सीधे खानदान से जुड़े शाह हुसैन और जॉर्डन के शाही परिवार की महिलाओं को देखें। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय इन महिलाओं को भी पारंपरिक बुर्के में शायद ही कभी देखा गया हो। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस्लाम के नाम पर एक ही तरह की सामाजिक बाध्यता बनाना न तो इतिहास से मेल खाता है और न ही आज की वैश्विक वास्तविकताओं से।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब बड़े मुस्लिम देश और पैगंबर के वंशज तक इस मुद्दे पर सख्ती नहीं दिखाते, तो भारत में इसे सियासत का हथियार क्यों बनाया जा रहा है। यह बहस आस्था से ज्यादा राजनीति की लगती है, जहां महिलाओं की स्वतंत्रता से ज्यादा वोटों की गणना अहम हो जाती है।