शिवराज सिंह चौहान ने देसी पशु नस्ल संरक्षण और पुरस्कार समारोह में किया सम्मान
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केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देसी पशु नस्लों के संरक्षण और किसानों की आय सुरक्षा को मजबूत करने पर जोर दिया।
नस्ल संरक्षण पुरस्कार में व्यक्तिगत और संस्थागत योगदान देने वाले किसानों और संस्थाओं को सम्मानित किया गया, राष्ट्रीय स्तर पर सराहना की।
Delhi/ इस अवसर पर श्री चौहान ने कहा कि भारत में पशु पालन सिर्फ आर्थिक या पोषण से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसका पर्यावरण और जैव विविधता से गहरा संबंध है। उन्होंने कहा, “देसी मवेशी, भैंस, मुर्गी और छोटे जुगाली करने वाले जानवर हमारी कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उनका संरक्षण किसानों की आय, रोज़गार और स्थायी खेती की सुरक्षा से सीधे जुड़ा है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि 2019 में शुरू की गई राष्ट्रीय पहल केवल पॉलिसी और गाइडलाइन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे गांवों और खेतों तक पहुंचाकर जन आंदोलन बनाना होगा। इस पहल में योगदान देने वालों को पहचानना भी महत्वपूर्ण है। “पहचान मिलने से प्रेरणा और दीर्घकालिक प्रभाव बढ़ता है।”
डॉ. जाट ने बताया कि भाकृअनुप ने अब तक 242 पशु नस्लों का पंजीकरण किया है और 2047 तक सभी देसी नस्लों का 100% पंजीकरण लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने मवेशियों की घटती आबादी और नस्ल संरक्षण में किसानों की अहम भूमिका पर भी प्रकाश डाला। नस्ल पंजीकरण केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जैविक संसाधनों पर संप्रभु अधिकार, लाभ-साझाकरण और आईपीआर सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
नस्ल संरक्षण पुरस्कार समारोह में व्यक्तिगत और संस्थागत श्रेणियों में उत्कृष्ट योगदान देने वालों को सम्मानित किया गया। श्री जीतुल बुरागोहेन को लुइट भैंस संरक्षण में प्रथम पुरस्कार मिला, जबकि श्री कुडाला राम दास को पुंगनूर मवेशियों के संरक्षण के लिए द्वितीय पुरस्कार दिया गया। संस्थागत श्रेणी में बिनझारपुरी मवेशी प्रमोटर्स एंड प्रोड्यूसर्स सोसाइटी को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
श्री चौहान ने कार्यक्रम में किसानों, वैज्ञानिकों और संस्थाओं के योगदान को सराहा और कहा कि यह पहल देश में पशु आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और स्थायी कृषि विकास में मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने मीडिया से भी आग्रह किया कि यह सकारात्मक प्रयास व्यापक जन तक पहुँचाएं।
भाकृअनुप के प्रयास:
भाकृअनुप ने 2008 से पशु नस्ल पंजीकरण कार्यक्रम शुरू किया। 2017 से वे नस्ल संरक्षण पुरस्कार प्रदान कर रहे हैं। आठ अधिसूचनाओं के तहत अब तक 229 स्वदेशी नस्लों को कानूनी मान्यता प्राप्त है। यह कदम बायोपायरेसी से सुरक्षा, लाभ-साझाकरण और नस्ल-विशिष्ट विकास नीतियों को सशक्त बनाता है।
कार्यक्रम ने भारत में पशुधन संरक्षण, किसान कल्याण और स्थायी कृषि के लिए सामूहिक प्रयासों की दिशा को और स्पष्ट किया।