सिद्धगंगा मठ में उपराष्ट्रपति ने दी शिवकुमार स्वामी को श्रद्धांजलि

Wed 21-Jan-2026,05:48 PM IST +05:30

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सिद्धगंगा मठ में उपराष्ट्रपति ने दी शिवकुमार स्वामी को श्रद्धांजलि VP-Siddaganga-Math-Shivakumara-Swamiji-Punyatithi
  • उपराष्ट्रपति ने सिद्धगंगा मठ में स्वामी शिवकुमार महास्वामीगलु की सातवीं पुण्यतिथि पर सेवा, करुणा और मानवता के मूल्यों को रेखांकित किया।

  • त्रिविध दासोहा परंपरा को भारतीय सामाजिक सेवा का आदर्श बताते हुए शिक्षा, भोजन और आश्रय को अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया।

Karnataka / Tumkur :

कर्नाटक/ कर्नाटक के तुमकुरु में स्थित ऐतिहासिक श्री सिद्धगंगा मठ में आयोजित डॉ. श्री श्री शिवकुमार महास्वामीगलु की सातवीं पुण्यतिथि के अवसर पर उपराष्ट्रपति श्री सीपी राधाकृष्णन ने संत को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि महास्वामीजी को समाधि ग्रहण किए सात वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन समय के साथ उनकी प्रासंगिकता और अधिक बढ़ी है। आज के अनिश्चित, विभाजनग्रस्त और महत्वाकांक्षा से भरे युग में उनका जीवन मानवता को स्वार्थ से ऊपर रखने की प्रेरणा देता है।

उपराष्ट्रपति ने 15वीं शताब्दी में स्थापित श्री सिद्धगंगा मठ की गौरवशाली परंपरा का उल्लेख करते हुए इसकी ‘त्रिविध दासोहा’—भोजन, शिक्षा और आश्रय—की सेवा परंपरा को भारतीय समाज का अनुकरणीय मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. श्री श्री शिवकुमार महास्वामीगलु, जिन्होंने 1941 में मठ की जिम्मेदारी संभाली, कर्मकांडों तक सीमित संत नहीं थे, बल्कि कर्मयोगी थे, जिन्होंने आध्यात्मिकता को सेवा में और भक्ति को कर्तव्य में बदला।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्वामीजी के जीवन ने इस शाश्वत भारतीय दर्शन को साकार किया कि सेवा ही साधना है और मानवता ही सर्वोच्च पूजा। वृद्धावस्था में भी उनका अनुशासन, विनम्रता और करुणा अटूट रही, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके मार्गदर्शन में सिद्धगंगा मठ एक व्यापक सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ, जिसने जाति, समुदाय और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर लाखों जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा, भोजन और आश्रय उपलब्ध कराया।

उन्होंने कहा कि मठ द्वारा दी जाने वाली सेवाएं दान नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार के साथ प्रदान की जाती हैं, जो सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा को मजबूत करती हैं। उपराष्ट्रपति ने विकसित भारत की यात्रा में ऐसे आध्यात्मिक संस्थानों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराएं धर्म, सेवा, वसुधैव कुटुंबकम और प्रकृति के प्रति श्रद्धा जैसे मूल्यों के माध्यम से समाज को स्थिरता प्रदान करती हैं।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में इन शाश्वत मूल्यों को शासन के माध्यम से वैश्विक मंचों पर संस्थागत अभिव्यक्ति मिली है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारतीय सभ्यतागत चेतना का पुनरुत्थान, विरासत और विकास के संतुलन का उदाहरण है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि अपनी जड़ों में दृढ़ विश्वास रखने वाला राष्ट्र आधुनिक दुनिया में अधिक आत्मविश्वासी और समावेशी बनता है।

समापन में उन्होंने कहा कि स्वामीजी को सच्ची श्रद्धांजलि शब्दों या पुष्पांजलि में नहीं, बल्कि कर्मों में निहित हैएक और बच्चे को शिक्षित करना, एक और भूखे को भोजन कराना और जरूरतमंद के साथ खड़ा होना। कार्यक्रम से पूर्व उपराष्ट्रपति ने मठ के पवित्र गद्दीगे में प्रार्थना की और छात्रों से संवाद भी किया।