Jallikattu 2026: पोंगल पर तमिल परंपरा, संस्कृति और कानून के बीच संतुलन की मिसाल

Fri 16-Jan-2026,02:33 PM IST +05:30

ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |

Follow Us

Jallikattu 2026: पोंगल पर तमिल परंपरा, संस्कृति और कानून के बीच संतुलन की मिसाल Jallikattu Tamilnadu 2026
  • पोंगल पर्व पर जल्लीकट्टू का सांस्कृतिक महत्व.

  • देशी सांडों की पहचान और संरक्षण की परंपरा.

  • कानून, सुरक्षा और पशु अधिकारों से जुड़ा विवाद.

Tamil Nadu / Chennai :

Chennai / तमिलनाडु की पारंपरिक संस्कृति से जुड़ा जल्लीकट्टू एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हर साल पोंगल के अवसर पर आयोजित होने वाला यह आयोजन केवल एक खेल नहीं, बल्कि तमिल पहचान, गौरव और परंपरा का प्रतीक माना जाता है। गांवों में पोंगल का उत्साह जल्लीकट्टू के बिना अधूरा समझा जाता है। हालांकि, बीते कुछ वर्षों से यह परंपरा संस्कृति और आधुनिक कानूनों के टकराव का भी प्रतीक बन गई है।

क्या है जल्लीकट्टू?
जल्लीकट्टू को अंग्रेज़ी में Bull Taming Sport कहा जाता है। इसमें एक ताकतवर देशी सांड को खुले मैदान में छोड़ा जाता है और युवक उसके कूबड़ को पकड़कर उसे काबू में करने की कोशिश करते हैं। इस खेल में न तो सांड को मारा जाता है और न ही उसका वध किया जाता है। उद्देश्य केवल यह दिखाना होता है कि कौन युवक सांड की ताकत, फुर्ती और उग्रता को नियंत्रित कर सकता है। यही कारण है कि इसे साहस और पराक्रम की परीक्षा माना जाता है।

पोंगल और जल्लीकट्टू का संबंध
जल्लीकट्टू का आयोजन आमतौर पर मकर संक्रांति के समय मनाए जाने वाले पोंगल पर्व के दौरान होता है। पोंगल कृषि और फसल कटाई से जुड़ा पर्व है, जिसमें किसान प्रकृति और पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। जल्लीकट्टू इसी भावना का विस्तार माना जाता है। सांडों को आयोजन से पहले अच्छे से खिलाया-पिलाया जाता है, सजाया जाता है और उनके सींगों पर रंग या कपड़े लगाए जाते हैं। कई गांवों में सांड को परिवार के सदस्य जैसा सम्मान दिया जाता है।

परंपरा और उद्देश्य
परंपरागत रूप से जल्लीकट्टू का मकसद मनोरंजन नहीं, बल्कि देशी नस्ल के सांडों की पहचान और संरक्षण रहा है। पुराने समय में खेती के लिए मजबूत और स्वस्थ बैलों की आवश्यकता होती थी। जल्लीकट्टू के जरिए यह तय किया जाता था कि कौन सा सांड सबसे ताकतवर और सहनशील है। ऐसे सांडों को बाद में प्रजनन के लिए चुना जाता था, जिससे अच्छी नस्ल आगे बढ़े। साथ ही, यह युवाओं की बहादुरी, आत्मविश्वास और शारीरिक क्षमता दिखाने का भी माध्यम था।

आयोजन की प्रक्रिया
जल्लीकट्टू के लिए एक खुला मैदान चुना जाता है। सांडों को एक संकरे रास्ते या बाड़े से बाहर छोड़ा जाता है। जैसे ही सांड बाहर आता है, युवक उसके कूबड़ को पकड़कर कुछ दूरी तक उसे रोकने या उसके साथ चलने की कोशिश करते हैं। जो युवक तय समय या दूरी तक सांड को संभाल लेता है, उसे विजेता माना जाता है। नियमों के अनुसार सांड को घायल करना, हथियारों का इस्तेमाल करना या किसी तरह की क्रूरता करना प्रतिबंधित होता है।

ऐतिहासिक जड़ें
इतिहासकारों के अनुसार जल्लीकट्टू की परंपरा 2000 साल से भी अधिक पुरानी है। तमिल साहित्य, विशेषकर संगम काल की रचनाओं में इसका उल्लेख मिलता है। पुराने ग्रंथों में इसे ‘एरुथु कत्तु’ कहा गया है, जिसका अर्थ है सांड को वश में करना। उस समय यह आयोजन राजाओं और जमींदारों के संरक्षण में होता था। गांव के सबसे बहादुर युवक को विशेष सम्मान मिलता था और कई बार विवाह के लिए भी ऐसे युवकों को प्राथमिकता दी जाती थी।

विवाद और कानूनी बहस
आधुनिक दौर में जल्लीकट्टू को लेकर पशु अधिकार संगठनों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस खेल में जानवरों के साथ क्रूरता होती है और इससे उनकी जान को खतरा रहता है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने एक समय पर इस पर रोक भी लगाई थी। बाद में तमिलनाडु सरकार ने कानून में संशोधन कर इसे सांस्कृतिक परंपरा के रूप में अनुमति दी।

आज का जल्लीकट्टू
आज जल्लीकट्टू सरकारी नियमों, पशु चिकित्सकों की निगरानी और सुरक्षा मानकों के तहत आयोजित किया जाता है। इस साल मदुरै के पास पालमेडु और अलंगानल्लूर में 16 और 17 जनवरी को पारंपरिक जल्लीकट्टू कार्यक्रम आयोजित होंगे। जल्लीकट्टू अब केवल एक खेल नहीं, बल्कि परंपरा, कानून और आधुनिक सोच के बीच संतुलन की एक जीवंत मिसाल बन चुका है।