विश्व स्वास्थ्य दिवस और भारत की बीमार व्यवस्था: नरेश गौतम

Tue 07-Apr-2026,12:50 AM IST +05:30

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विश्व स्वास्थ्य दिवस और भारत की बीमार व्यवस्था: नरेश गौतम World Health Day
  • भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर स्थिति उजागर. 

  • अंधविश्वास और महंगे इलाज से आम जनता प्रभावित. 

  • वैज्ञानिक सोच और बेहतर स्वास्थ्य निवेश की जरूरत. 

Chhattisgarh / Raipur :

Raipur / विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम है “स्वास्थ्य के लिए एकजुटता और विज्ञान के साथ खड़े होना।” यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया को यह याद दिलाने की कोशिश है कि स्वास्थ्य को अंधविश्वास, अफवाह, राजनीति और मुनाफे से बचाकर विज्ञान, सहयोग और मानवीय जिम्मेदारी के आधार पर देखा जाना चाहिए। लेकिन भारत की वास्तविकता इन आदर्श शब्दों से बहुत दूर दिखाई देती है। यहाँ आज भी बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए वैज्ञानिक पद्धति से अधिक बाबाओं, झाड़-फूंक, जादू-टोना, घरेलू चमत्कारों और फर्जी डॉक्टरों पर भरोसा करने को मजबूर हैं। यह केवल अशिक्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि बेहद बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था का  परिणाम है। जब अस्पताल महंगे हो जाएँ, डॉक्टर न मिलें, दवाएँ गायब हों और गरीब इलाज के बिना मरने लगे, तब समाज अंधविश्वास की तरफ सुनियोजित तरीके से धकेला जाता है। भारत में बीमारी को अब भी केवल व्यक्ति की निजी समस्या माना जाता है, जबकि बीमारी का संबंध समाज से भी होता है। गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, प्रदूषण, जहरीला भोजन, खराब पानी, तनाव, असुरक्षित काम और असमानता लोगों को बीमार बनाते हैं। लेकिन हमारी व्यवस्था इन कारणों को देखने के बजाय बीमारी को केवल एक मेडिकल रिपोर्ट तक सीमित कर देती है। हालिया स्टेट ऑफ हेल्थकेयर इन रूरल इंडिया, 2024’ की रिपोर्ट में डॉक्टर-रोगी अनुपात लगभग 1:1456 है, जो कि भारत जनसंख्या के अनुसार बहुत खराब स्थिति को दर्शाता है।   

कोविड-19 ने इस देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की असली तस्वीर सबके सामने ला दी थी। उस समय लोगों के पास वैज्ञानिक जानकारी कम थी, लेकिन सलाह देने वाले बहुत थे। कोई काढ़ा बता रहा था, कोई गोमूत्र पीला रहा था, कोई गोबर से नहाने की बात कर रहा था तो कोई बाबाओं के चमत्कार से ठीक होने की बात कर रहा था और वही सत्ता की ताली, थाली और मोमबत्ती के बीच आम आदमी अस्पताल, ऑक्सीजन और दवा के लिए भटकता हुआ दम तोड़ रहा था। बेड नहीं थे, ऑक्सीजन नहीं थी, दवाएँ नहीं थीं और लोग अपने परिजनों को बचाने के लिए दर-दर भटक रहे थे। कोविड ने यह साफ कर दिया कि जब व्यवस्था टूटती है तो बीमारी गरीब और अमीर में भेद नहीं करती, लेकिन इलाज जरूर करता है। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था अब दो हिस्सों में बँट चुकी है, गरीबों के लिए सरकारी अस्पताल और अमीरों के लिए निजी अस्पताल। सरकारी अस्पतालों की हालत लगातार बदतर होती जा रही है। डॉक्टरों की कमी, दवाओं की कमी, मशीनों का खराब होना, लंबी लाइनें, गंदगी और भ्रष्टाचार अब आम बात हो चुकी है। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी भयावह है। हजारों गाँव आज भी ऐसे हैं जहाँ लोगों को इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद वर्षों से खाली पड़े हैं। कई राज्यों में आधे से ज्यादा सरकारी डॉक्टरों के पद रिक्त हैं। सरकारें स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का दावा जरूर करती हैं, लेकिन बजट कुछ और कहानी कहता है। भारत में सरकारी स्वास्थ्य खर्च अब भी जीडीपी के लगभग 2 से 2.5 प्रतिशत के आसपास ही है। विकसित देशों में यही खर्च 6 से 10 प्रतिशत तक पहुँचता है। इसका सीधा मतलब है कि भारत में स्वास्थ्य को अभी भी बुनियादी अधिकार नहीं, बल्कि खर्च समझा जाता है। इसका सबसे बड़ा असर गरीब और निम्न मध्यम वर्ग पर पड़ता है। बीमारी उन्हें केवल शारीरिक रूप से नहीं तोड़ती, बल्कि आर्थिक रूप से भी तबाह कर देती है। एक गंभीर बीमारी पूरे परिवार को कर्ज में डुबो सकती है। इलाज के लिए लोग जमीन बेचते हैं, गहने गिरवी रखते हैं, रिश्तेदारों से उधार लेते हैं। लाखों लोग हर साल केवल इलाज के खर्च की वजह से गरीबी में चले जाते हैं। निजी अस्पतालों का हाल और भी चिंताजनक है। वहाँ इलाज अब सेवा नहीं, बल्कि एक उद्योग बन चुका है। भर्ती, जांच, ऑपरेशन, आईसीयू, दवा, हर चीज का लंबा बिल बनाया जाता है। कई निजी अस्पताल मरीज की बीमारी से पहले उसकी आर्थिक हैसियत देखते हैं। कोविड के दौरान यह खुलकर सामने आया। एक बेड, एक ऑक्सीजन सिलेंडर, एक इंजेक्शन और एक एम्बुलेंस के लिए हजारों-लाखों रुपये वसूले गए। जिनके पास पैसा था, वे बच गए। जिनके पास पैसा नहीं था, वे अस्पतालों के बाहर दम तोड़ते रहे।

2017 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के बीच 60 से अधिक बच्चों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। बाद में सामने आया कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का भुगतान महीनों से अटका हुआ था। बार-बार चेतावनी देने के बावजूद प्रशासन और सरकार ने ध्यान नहीं दिया। उस घटना ने दिखाया कि भारत में गरीब की जान कितनी सस्ती है। यह केवल एक अस्पताल की विफलता नहीं थी, बल्कि यह पूरे सिस्टम की सड़ांध का उदाहरण था। आज भी देश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों को बाहर से दवाएँ खरीदनी पड़ती हैं। कई बार मशीनें महीनों खराब रहती हैं। जांच के लिए निजी लैब में भेजा जाता है। डॉक्टर कम हैं, लेकिन मरीजों की लाइनें लंबी हैं। स्वास्थ्य सेवा धीरे-धीरे सरकारी जिम्मेदारी से निकलकर बाजार के हाथों में जा चुकी है। दवा उद्योग का हाल भी कम खतरनाक नहीं है। नकली दवाएँ, एक्सपायरी दवाओं की नई पैकिंग, कमीशन पर दवा लिखना और बिना लाइसेंस के मेडिकल स्टोर भी आम होते जा रहे हैं। कई डॉक्टर वही दवा लिखते हैं, जिस पर उन्हें अधिक कमीशन मिलता है। गरीब मरीज को सस्ती दवा नहीं, बल्कि महंगी दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। उज्बेकिस्तान, गाम्बिया और भारत में भी भारतीय कंपनियों के कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत की घटनाओं ने भारत की दवा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। सवाल यह नहीं है कि ऐसी दवाएँ बाहर कैसे पहुँचीं, बल्कि यह है कि वे बाजार तक पहुँचती ही क्यों हैं? जाँच कौन करता है? जिम्मेदारी किसकी है? और हर हादसे के बाद केवल जांच समिति बनाकर मामले को दबा क्यों दिया जाता है?

भारत का संविधान हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। अदालतें कई बार कह चुकी हैं कि स्वास्थ्य भी जीवन के अधिकार का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कहा है कि किसी भी घायल या बीमार व्यक्ति को इलाज देने से अस्पताल मना नहीं कर सकते। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी इस देश में गरीब आदमी अस्पताल के दरवाजे पर खड़ा होकर मर जाता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर स्वास्थ्य अधिकार है, तो फिर यह अधिकार केवल पैसे वालों तक क्यों सीमित है? डॉक्टर क्यों नहीं हैं? दवाएँ क्यों नहीं हैं? ऑक्सीजन क्यों नहीं है? ग्रामीण अस्पताल खाली क्यों हैं? और सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने के बजाय निजी अस्पतालों के लिए जगह क्यों बना रही हैं? विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विज्ञान की बात करना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है स्वास्थ्य को बाजार से बचाना। जब तक स्वास्थ्य को मुनाफे की चीज माना जाएगा, तब तक गरीब इलाज के बिना मरता रहेगा और अमीर इलाज खरीदता रहेगा।