बस्तर पंडुम 2026: सुकमा में जनजातीय संस्कृति और लोककलाओं का भव्य उत्सव

Sat 17-Jan-2026,05:08 PM IST +05:30

ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |

Follow Us

बस्तर पंडुम 2026: सुकमा में जनजातीय संस्कृति और लोककलाओं का भव्य उत्सव Bastar-Pandum-2026-Sukma-Tribal-Culture-Festival
  • बस्तर पंडुम-2026 के जनपद स्तरीय आयोजन में जनजातीय संस्कृति, लोकनृत्य, पारंपरिक गीत और शिल्प कलाओं की भव्य प्रस्तुति देखने को मिली।

  • 12 सांस्कृतिक विधाओं में प्रतियोगिताएं आयोजित, विजेताओं को 10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि देकर स्थानीय कलाकारों को सम्मानित किया गया।

  • मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर की सांस्कृतिक विरासत संरक्षण की दिशा में बस्तर पंडुम एक महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरा।

Chhattisgarh / Bastar :

Bastar/ कार्यक्रम की शुरुआत छत्तीसगढ़ महतारी के तैलचित्र पर माल्यार्पण और पूजा-अर्चना से हुई। आयोजन का उद्देश्य बस्तर की जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक कला, वेशभूषा, आभूषण और लोक जीवन को संरक्षित करना रहा। प्रतियोगिताओं के जरिए स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच प्रदान किया गया, जिससे सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिल सके।

इस दौरान कुल 12 विभिन्न विधाओं में प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं, जिनमें लोक नृत्य, पारंपरिक गीत, नाट्य कला और शिल्प कला प्रमुख रहीं। प्रत्येक विधा में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले कलाकारों को 10-10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी गई, जबकि अन्य प्रतिभागियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

मुख्य अतिथि एवं महिला आयोग की सदस्य दीपिका सोरी ने कहा कि “हमारी पुरानी संस्कृति ही हमारी असली पहचान है। स्वर्ग से सुंदर बस्तर को बचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।” उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर पंडुम को जनजातीय संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक अहम पहल बताया।

वरिष्ठ जनप्रतिनिधि धनीराम बारसे ने बस्तर पंडुम को समाज को जोड़ने वाला उत्सव बताया, जबकि जिला पंचायत सीईओ मुकुन्द ठाकुर ने कहा कि ऐसे आयोजन जमीनी स्तर पर बस्तर की भाषा, संस्कृति और विविधता को समझने का सशक्त माध्यम हैं।

कार्यक्रम के दौरान अतिथियों ने माड़िया पेज, लांदा, सल्फी और चापड़ा चटनी जैसे पारंपरिक व्यंजनों के स्टॉलों का निरीक्षण किया और उनकी सराहना की। बस्तर पंडुम-2026 ने न केवल स्थानीय कलाकारों को मंच दिया, बल्कि लुप्त होती परंपराओं को नई ऊर्जा और पहचान भी प्रदान की।