वैश्विक शिक्षा का बदलता नक्शा: रिसर्च रैंकिंग में हार्वर्ड पीछे, चीन की यूनिवर्सिटीज़ आगे
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Global University Ranking
रिसर्च रैंकिंग में हार्वर्ड की स्थिति कमजोर, चीन आगे.
भारी निवेश और नीतिगत सुधारों से चीनी यूनिवर्सिटीज़ को बढ़त.
वैश्विक शिक्षा व्यवस्था अब बहुध्रुवीय दौर में प्रवेश.
Delhi / दशकों तक दुनिया की सर्वोच्च यूनिवर्सिटी मानी जाने वाली हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। हालिया रिसर्च आधारित वैश्विक यूनिवर्सिटी रैंकिंग में हार्वर्ड कुछ प्रमुख मापदंडों पर टॉप पोजिशन से फिसलती नजर आई है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रिसर्च आउटपुट और प्रभाव जैसे संकेतकों में हार्वर्ड अब लगभग 30वें स्थान के आसपास पहुंच गई है। इसके उलट, चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी, शिंधुआ यूनिवर्सिटी और पेकिंग यूनिवर्सिटी ने तेजी से ऊंची छलांग लगाते हुए खुद को दुनिया की अग्रणी रिसर्च संस्थाओं में स्थापित कर लिया है।
विश्व यूनिवर्सिटी रैंकिंग केवल नाम या परंपरा पर नहीं, बल्कि ठोस अकादमिक आंकड़ों पर आधारित होती है। इसमें प्रकाशित रिसर्च पेपर्स की संख्या, उन पर मिलने वाले उद्धरण (citations), कुल रिसर्च आउटपुट, रिसर्च का वैश्विक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मानकों को प्रमुखता दी जाती है। इन पैमानों पर चीन की यूनिवर्सिटीज़ ने बीते दो दशकों में असाधारण प्रगति दिखाई है। खास बात यह है कि चीन ने उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाते हुए भारी निवेश किया, जिसका असर अब वैश्विक मंच पर साफ दिख रहा है।
चीन की सफलता के पीछे उसकी नीतिगत सोच को अहम माना जा रहा है। वहां विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की नियुक्ति और प्रमोशन को सीधे रिसर्च से जोड़ा गया। जितना अधिक गुणवत्ता वाला शोध, उतनी बेहतर अकादमिक प्रगति। इसके साथ ही आधुनिक प्रयोगशालाएं, अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स तक आसान पहुंच, विदेशी शोधकर्ताओं के साथ साझेदारी और सरकारी फंडिंग ने रिसर्च को गति दी। नतीजा यह हुआ कि चीनी यूनिवर्सिटीज़ हर साल बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध पत्र प्रकाशित करने लगीं और उनके citations भी तेजी से बढ़े।
दूसरी ओर, हार्वर्ड जैसी अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ अब भी शिक्षा, नवाचार और स्टार्टअप कल्चर में मजबूत मानी जाती हैं। हार्वर्ड के पास विश्वस्तरीय फैकल्टी, संसाधन और अकादमिक स्वतंत्रता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि रिसर्च की रफ्तार और मात्रा के मामले में अमेरिका की पारंपरिक बढ़त अब पहले जैसी नहीं रही। फंडिंग पैटर्न, प्रशासनिक जटिलताएं और रिसर्च प्राथमिकताओं में बदलाव ने भी इस गिरावट में भूमिका निभाई है।
शिक्षा विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि रैंकिंग में बदलाव का मतलब यह नहीं कि हार्वर्ड या अन्य अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ की गुणवत्ता खत्म हो गई है। बल्कि यह संकेत है कि वैश्विक शिक्षा व्यवस्था अब बहुध्रुवीय (multi-polar) हो रही है। यानी अब उच्च शिक्षा और रिसर्च के अवसर केवल अमेरिका या यूरोप तक सीमित नहीं हैं। एशिया, खासकर चीन, एक बड़े अकादमिक केंद्र के रूप में उभर रहा है।
इस बदलाव का असर छात्रों और रिसर्चर्स पर भी पड़ रहा है। पहले जहां अंतरराष्ट्रीय छात्र केवल आइवी लीग यूनिवर्सिटीज़ को लक्ष्य मानते थे, अब वे एशियाई संस्थानों की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं। बेहतर फंडिंग, अत्याधुनिक सुविधाएं और तेजी से बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा चीन की यूनिवर्सिटीज़ को एक मजबूत विकल्प बना रही हैं।
कुल मिलाकर, हार्वर्ड का पीछे होना और चीन की यूनिवर्सिटीज़ का आगे आना सिर्फ एक रैंकिंग की कहानी नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शिक्षा संतुलन में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रतिस्पर्धा के इस नए दौर में कौन सी यूनिवर्सिटीज़ ज्ञान और नवाचार की दौड़ में बाज़ी मारती हैं।