ग्राम स्वराज के शिल्पकार जे. सी. कुमारप्पा और आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा
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ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भर भारत का समर्थक.
ग्रामीण उद्योग, खादी और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा.
नैतिक अर्थव्यवस्था और सतत विकास पर जोर.
AGCNN / भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक ऐसे चिंतक और कर्मयोगी हुए, जिन्होंने राजनीति के साथ-साथ समाज और अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का कार्य किया। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण नाम है जे. सी. कुमारप्पा, जिन्हें भारत में गांधीवादी अर्थशास्त्र का प्रमुख स्तंभ माना जाता है। वे केवल एक अर्थशास्त्री नहीं थे, बल्कि ग्राम स्वराज, आत्मनिर्भरता और नैतिक अर्थव्यवस्था के प्रबल समर्थक थे। उनकी जयंती पर उनके विचारों और कार्यों को स्मरण करना आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
जे. सी. कुमारप्पा का पूरा नाम जोसेफ चेल्लादुरई कुमारप्पा था। उनका जन्म 4 जनवरी 1892 को तमिलनाडु के तंजावुर जिले में हुआ। उनका परिवार शिक्षित और सामाजिक चेतना से जुड़ा हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा भारत में प्राप्त करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन किया। पश्चिमी अर्थशास्त्र की गहरी समझ रखने के बावजूद कुमारप्पा ने भारतीय सामाजिक यथार्थ को अपने चिंतन का केंद्र बनाया।
भारत लौटने के बाद जे. सी. कुमारप्पा का संपर्क महात्मा गांधी से हुआ, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अपने ज्ञान और क्षमता को राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया। वे गांधीजी के निकट सहयोगी बने और उनके आर्थिक विचारों को व्यवहारिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुमारप्पा का मानना था कि यदि भारत को सच्ची स्वतंत्रता चाहिए, तो उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना होगा। जे. सी. कुमारप्पा ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गांवों से जोड़कर देखने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और गांवों के विकास के बिना देश का विकास अधूरा है। उन्होंने ग्रामीण उद्योगों, कुटीर उद्योगों और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया। उनका मानना था कि बड़े उद्योग सीमित लोगों को लाभ पहुंचाते हैं, जबकि ग्रामीण उद्योग रोजगार के साथ-साथ सामाजिक संतुलन भी बनाए रखते हैं।
कुमारप्पा ने खादी और ग्रामोद्योग के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई। वे अखिल भारतीय चरखा संघ और अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। उन्होंने गांवों में स्वावलंबन पैदा करने के लिए उत्पादन और उपभोग की स्थानीय व्यवस्था पर बल दिया। उनका कहना था कि गांव अपने भोजन, वस्त्र और आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करें, ताकि शोषण और निर्भरता से मुक्ति मिल सके। जे. सी. कुमारप्पा का आर्थिक चिंतन नैतिक मूल्यों पर आधारित था। वे ऐसी अर्थव्यवस्था के पक्षधर थे, जिसमें लाभ के साथ-साथ मानवता, पर्यावरण और सामाजिक न्याय का भी ध्यान रखा जाए। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग पर बल दिया और अंधाधुंध औद्योगीकरण का विरोध किया। उनके विचार आज के पर्यावरण संकट के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।
कुमारप्पा ने अपने लेखन के माध्यम से भी समाज को दिशा देने का कार्य किया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘इकोनॉमी ऑफ परमानेंस’ में उन्होंने स्थायी और संतुलित विकास की अवधारणा प्रस्तुत की। इस पुस्तक में उन्होंने ऐसी अर्थव्यवस्था की कल्पना की, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चले और आने वाली पीढ़ियों के हितों की रक्षा करे। यह विचार उस समय के लिए क्रांतिकारी था, जब औद्योगिक विकास को ही प्रगति का एकमात्र पैमाना माना जाता था स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जे. सी. कुमारप्पा ने कई रचनात्मक कार्यक्रमों का संचालन किया। वे गांव-गांव जाकर लोगों को स्वदेशी, स्वावलंबन और श्रम की गरिमा का महत्व समझाते थे। उन्होंने युवाओं को नौकरी की मानसिकता से बाहर निकालकर स्वरोजगार की ओर प्रेरित किया। उनका मानना था कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता खोखली होती है।
स्वतंत्रता के बाद भी कुमारप्पा ने सत्ता या पद की बजाय सेवा और विचार को प्राथमिकता दी। वे नीति-निर्माण से जुड़े रहे, लेकिन हमेशा गांधीवादी मूल्यों के अनुरूप ही अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने योजना आयोग और अन्य संस्थाओं के माध्यम से ग्रामीण विकास से जुड़े सुझाव दिए, हालांकि उनके कई विचार तत्कालीन औद्योगिक नीतियों से मेल नहीं खाते थे। जे. सी. कुमारप्पा का जीवन सादगी, ईमानदारी और प्रतिबद्धता का उदाहरण था। उन्होंने अपने ज्ञान का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए किया। उनका निधन 30 जनवरी 1960 को हुआ, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं और सामाजिक कार्यकर्ताओं, अर्थशास्त्रियों तथा नीति-निर्माताओं को दिशा देते हैं।
आज जब देश बेरोजगारी, ग्रामीण संकट, पर्यावरण असंतुलन और आर्थिक असमानता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब जे. सी. कुमारप्पा के विचार हमें एक वैकल्पिक मार्ग दिखाते हैं। उनका ग्राम आधारित, नैतिक और आत्मनिर्भर अर्थशास्त्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता आंदोलन के समय था।
जे. सी. कुमारप्पा की जयंती हमें यह अवसर देती है कि हम केवल उन्हें याद ही न करें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन और नीतियों में उतारने का प्रयास भी करें। वे सही मायनों में गांधीवादी चिंतन के ऐसे दीपक थे, जिन्होंने अर्थशास्त्र को मानवता और नैतिकता से जोड़ा और भारत को आत्मनिर्भर बनने का सपना दिखाया।