प्रेम और शांति का मंत्र है विजयरत्न सुंदर सूरीश्वरजी महाराज की 500वीं पुस्तक: प्रधानमंत्री मोदी
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प्रधानमंत्री मोदी ने विजयरत्न सुंदर सूरीश्वरजी की 500वीं पुस्तक को मानवता के लिए प्रेम और शांति का मंत्र बताया।
जैन दर्शन के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने वाले साहित्य की सराहना।
विकसित भारत के निर्माण हेतु नौ सामाजिक संकल्पों को दोहराया गया।
दिल्ली/ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीमद् विजयरत्न सुंदर सूरीश्वरजी महाराज की 500वीं पुस्तक के विमोचन अवसर पर देश और विश्व को प्रेम, अहिंसा और सहअस्तित्व का संदेश दिया। यह संबोधन वीडियो संदेश के माध्यम से एक आध्यात्मिक समारोह में दिया गया। अवसर विशेष रहा क्योंकि यह विमोचन न केवल एक साहित्यिक उपलब्धि था, बल्कि जैन दर्शन और मानवीय मूल्यों को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास भी था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत “जय जिनेंद्र” के साथ करते हुए जैन परंपरा के महान संतों और आचार्यों को नमन किया। उन्होंने पूज्य भुवनभानुसूरीश्वर जी महाराज, पूज्य विजय राजेंद्रसूरीश्वर जी महाराज, कल्पतरूसूरीश्वर जी महाराज तथा आचार्य श्रीमद् विजयरत्न सुंदर सूरीश्वर जी महाराज को प्रेरणास्रोत बताते हुए उनके योगदान की सराहना की।
प्रधानमंत्री ने कहा कि विजयरत्न सुंदर सूरीश्वरजी महाराज ने ज्ञान को केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन में उतारकर समाज को दिशा देने का कार्य किया है। उनका व्यक्तित्व संयम, सरलता और करुणा का जीवंत उदाहरण है। प्रधानमंत्री ने कहा कि महाराज साहब के शब्द अनुभव से निकलते हैं, उनकी वाणी करुणा से ओतप्रोत होती है और उनका मौन भी मार्गदर्शन करता है।
महाराज साहब की 500वीं पुस्तक “प्रेमनु विश्व, विश्वनो प्रेम” को प्रधानमंत्री ने केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवता के लिए मंत्र बताया। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया विभाजन, संघर्ष और असहिष्णुता से जूझ रही है, तब प्रेम और सद्भाव का यह संदेश वैश्विक शांति की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है।
प्रधानमंत्री ने जैन दर्शन के मूल सूत्र “परस्पर उपग्रहो जीवानाम्” का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक जीवन एक-दूसरे से जुड़ा है। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज, राष्ट्र और मानवता के हित में सोचने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि महाराज साहब की 500 रचनाएं विचारों का ऐसा सागर हैं, जिनमें जीवन की जटिल समस्याओं के सरल और आध्यात्मिक समाधान निहित हैं।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने नवकार महामंत्र दिवस का स्मरण करते हुए समाज के लिए नौ संकल्पों को दोहराया, जल संरक्षण, एक पेड़ माँ के नाम, स्वच्छता, वोकल फॉर लोकल, देश दर्शन, प्राकृतिक खेती, स्वस्थ जीवनशैली, योग-खेल को अपनाना और गरीबों की सहायता। उन्होंने कहा कि ये संकल्प विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रधानमंत्री ने भारत की युवा शक्ति की प्रशंसा करते हुए कहा कि देश की युवा पीढ़ी आधुनिक विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक जड़ों को भी मजबूत कर रही है। इस परिवर्तन में संतों, आचार्यों और उनके साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अंत में प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम में स्वयं उपस्थित न हो पाने पर खेद व्यक्त किया और वीडियो संदेश के माध्यम से संवाद का अवसर देने के लिए महाराज साहब के प्रति आभार प्रकट किया। उन्होंने विश्वास जताया कि विजयरत्न सुंदर सूरीश्वरजी महाराज के विचार भारत की बौद्धिक, नैतिक और मानवीय यात्रा को निरंतर प्रकाश देते रहेंगे।