करियर आइडेंटिटी क्या है और बदलाव के दौर में यह क्यों ज़रूरी है
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Personal Identity vs Career
करियर आइडेंटिटी और पर्सनल आइडेंटिटी में अंतर.
बदलाव के दौर में पुरानी पहचान कैसे रोक बनती है.
संतुलित करियर आइडेंटिटी से मानसिक मजबूती.
Nagpur / अगर आप अपने करियर में किसी बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह समझना बेहद ज़रूरी है कि करियर आइडेंटिटी (Career Identity) क्या होती है और यह आपके जीवन में क्यों मायने रखती है। कभी-कभी सोशल मीडिया पर कोई साधारण-सा सवाल भी हमें गहराई से सोचने पर मजबूर कर देता है। हाल ही में एक ऑनलाइन चर्चा में किसी ने पूछा— “क्या आप अपने काम को अपने जीवन का सिर्फ एक हिस्सा मानते हैं, या वही आपकी पहचान बन चुका है?”
यह सवाल दिखने में सरल है, लेकिन इसके भीतर बहुत गहरी मनोवैज्ञानिक परतें छिपी हैं।
असल में, यह सवाल यही पूछ रहा है कि आपकी करियर पहचान क्या है और वह आपकी व्यक्तिगत पहचान से कितनी जुड़ी हुई है। रिसर्च बताती है कि इंसान के भीतर एक साथ कई पहचानें मौजूद हो सकती हैं—एक पर्सनल आइडेंटिटी, जो इस सवाल का जवाब देती है “मैं कौन हूँ?” और दूसरी करियर आइडेंटिटी, जो जवाब देती है “मैं क्या करता/करती हूँ?”
पर्सनल आइडेंटिटी गहरी और स्थायी होती है, जबकि करियर आइडेंटिटी स्थितिजन्य होती है और समय, भूमिका और परिस्थितियों के साथ बदल सकती है।
यही फर्क समझना बहुत ज़रूरी है। जब कोई कहता है, “मैं एक डॉक्टर हूँ” या “मैं एक इंजीनियर हूँ”, तो यह एक मजबूत करियर पहचान का उदाहरण है। कई बार यह पहचान उस संस्था या संगठन से भी जुड़ जाती है, जहां व्यक्ति काम करता है। वहीं कुछ लोगों की करियर पहचान कमजोर होती है—उन्हें खुद भी ठीक से नहीं पता होता कि वे क्या करते हैं या वे अपने काम से संतुष्ट नहीं होते।
यह कोई गलत बात नहीं है। ज़रूरी यह है कि आपकी करियर पहचान संतुलित हो—इतनी मजबूत कि आप “मैं क्या करता हूँ?” का साफ जवाब दे सकें, लेकिन इतनी हावी नहीं कि वही आपकी पूरी पहचान बन जाए।
याद रखने वाली सबसे अहम बात यह है: आपकी करियर पहचान, आपकी पूरी पहचान नहीं है।
कुछ लोगों के लिए करियर उनकी पर्सनल आइडेंटिटी का अहम हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह कभी भी “मैं कौन हूँ?” का पूरा जवाब नहीं होना चाहिए। करियर समय के साथ बदलता है, इसलिए अगर आप अपनी पूरी पहचान उसी पर टिकाएंगे, तो बदलाव के समय जमीन खिसक सकती है।
अब सवाल यह है कि करियर आइडेंटिटी पर सोचने की ज़रूरत क्यों है?
सबसे पहला कारण यह है कि पुरानी करियर पहचान आपको आगे बढ़ने से रोक सकती है।
हम अक्सर करियर से जुड़े फैसले दिल और दिमाग—दोनों के मिश्रण से लेते हैं। कई बार हमारे भीतर की आवाज़ कहती है, “मैं तो हमेशा से टीचर रहा हूँ, इसके अलावा क्या कर सकता हूँ?” या “मैंने तो खुद को डॉक्टर ही माना था, अब कुछ और कैसे सोचूँ?”
यह सोच पुरानी करियर पहचान से आती है। अगर आप यह कल्पना ही नहीं करेंगे कि आपकी अगली करियर पहचान क्या हो सकती है, तो आप नए स्किल सीखने, नए लोगों से जुड़ने या अलग तरह के अवसर तलाशने से खुद को रोक लेंगे। पुरानी पहचान को छोड़कर नई पहचान को अपनाना आपको ठोस कदम उठाने की हिम्मत देता है।
दूसरा कारण है कि एक स्पष्ट करियर पहचान आपको बदलाव के लिए तैयार रखती है।
आज के दौर में बदलाव थकाने वाला हो सकता है, लेकिन उससे बचा नहीं जा सकता। जब आपकी करियर पहचान साफ होती है, तो वह आपको प्रेरित करती है कि आप उसी के अनुरूप अपने व्यवहार और फैसलों को ढालें। मनोवैज्ञानिक इसे sensemaking कहते हैं—यानी अपनी पहचान के अनुसार काम करने की स्वाभाविक इच्छा।
इसके अलावा, जब आप किसी प्रोफेशनल समूह या समुदाय से खुद को जोड़ते हैं, तो आपको सीखने, नेटवर्किंग करने और बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा मिलती है।
तीसरा और सबसे अहम कारण है मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत संतुलन।
अगर आपकी करियर पहचान बहुत ज़्यादा मजबूत और एकतरफा हो जाती है, तो वह आपकी मानसिक सेहत के लिए खतरा बन सकती है। रिटायरमेंट, नौकरी छूटना, बिज़नेस बंद होना—इन स्थितियों में अगर आपकी पूरी पहचान ही काम से जुड़ी हो, तो इंसान अंदर से टूट सकता है।
एक संतुलित करियर पहचान वह होती है, जिसमें आपकी रुचियां, क्षमताएं और ताकतें शामिल हों—ऐसी पहचान जो आपको दूसरों से अलग बनाती है, लेकिन आपको किसी एक भूमिका तक सीमित नहीं करती।
अंत में, सबसे ज़रूरी बात यही है कि आपकी करियर पहचान संतुलित हो। न तो इतनी कमजोर कि आपको खुद न पता हो आप क्या करना चाहते हैं, और न इतनी हावी कि वही आपकी पूरी पहचान बन जाए।
आज खुद से एक सवाल पूछिए— “मैं क्या करता/करती हूँ, और आने वाले समय में मैं क्या बनना चाहता/चाहती हूँ?”
इस सवाल का ईमानदार जवाब ही आपको बदलाव के दौर में स्थिर, आत्मविश्वासी और मानसिक रूप से मज़बूत बनाए रखेगा।