मामला बिहटा के सिकंदरपुर मौजा से जुड़ा है, जहां सरकारी भूमि बैंक के लिए जमीन अधिग्रहण किया गया था। इस जमीन के बदले किसानों को मुआवजा दिया जाना था, लेकिन जांच में सामने आया कि मुआवजे की राशि में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग को इस संबंध में कुल 11 शिकायतें मिली थीं। इन्हीं शिकायतों के आधार पर जब निगरानी ब्यूरो ने प्रारंभिक जांच शुरू की, तो शुरुआती स्तर पर ही करीब 55 लाख रुपये के गबन की पुष्टि हो गई। जांच अधिकारियों के अनुसार, किसानों के नाम पर जारी मुआवजे की रकम को कागजी खेल और फर्जी दस्तावेजों के जरिए अलग-अलग खातों में डायवर्ट किया गया।
इस मामले में दर्ज प्राथमिकी, कांड संख्या 01/2026, में कई बड़े और जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों के नाम शामिल हैं। तत्कालीन जिला भू-अर्जन पदाधिकारी, अपर जिला भू-अर्जन पदाधिकारी और बिहटा के तत्कालीन अंचलाधिकारी को मुख्य आरोपी बनाया गया है। इनके अलावा कानूनगो, अमीन, राजस्व कर्मचारी और एक बिचौलिये की भूमिका भी सामने आई है। जांच एजेंसी का मानना है कि यह पूरा फर्जीवाड़ा बिना आपसी मिलीभगत के संभव नहीं था। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 और 120बी के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
सूत्र बताते हैं कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े कागजातों में जानबूझकर गलत प्रविष्टियां की गईं, कुछ मामलों में असली लाभार्थियों के नाम हटाकर दूसरे लोगों के नाम जोड़ दिए गए और कहीं-कहीं जमीन के रकबे और मूल्यांकन में भी गड़बड़ी की गई। इस पूरी प्रक्रिया में बिचौलियों की भूमिका अहम रही, जिन्होंने अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच समन्वय बनाकर इस घोटाले को अंजाम दिया।
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने साफ किया है कि फिलहाल यह कार्रवाई सिर्फ एक परिवादी की शिकायत के आधार पर की गई है, जबकि बाकी 10 शिकायतों की जांच अभी जारी है। ऐसे में आने वाले दिनों में घोटाले की राशि और बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ब्यूरो ने यह भी संकेत दिया है कि जांच का दायरा बढ़ाया जाएगा और जरूरत पड़ने पर अन्य जिलों में हुए भूमि अधिग्रहण मामलों की भी पड़ताल की जा सकती है।
इस कार्रवाई के साथ निगरानी ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख दोहराया है और आम लोगों से अपील की है कि वे किसी भी तरह की गड़बड़ी या घूसखोरी की सूचना बेझिझक टोल-फ्री नंबर पर दें। विभाग का कहना है कि चाहे आरोपी कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, इस घोटाले में शामिल किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। 2026 की यह पहली बड़ी कार्रवाई यह संकेत दे रही है कि बिहार में भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने की तैयारी अब और तेज होने वाली है।