MGAHV में राष्ट्रीय युवा दिवस पर कार्यक्रम: डॉ. पांडेय ने श्रीरामकृष्ण परमहंस से विवेकानन्द तक की नवजागरण परंपरा का किया विश्लेषण
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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय युवा दिवस पर स्वामी विवेकानन्द और भारतीय नवजागरण पर केंद्रित विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ।
डॉ. कृष्ण चन्द पांडेय ने श्रीरामकृष्ण परमहंस से विवेकानन्द तक की नवजागरण परंपरा का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को भारतीय अध्यात्म, वेदान्त और राष्ट्रबोध से जोड़ना रहा।
वर्धा/ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर भारतीय अध्यात्म-विद्या, वेदान्त और भारतीय नवजागरण के महान उद्घोषक स्वामी विवेकानन्द को समर्पित एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह आयोजन न केवल स्मरणात्मक था, बल्कि भारत के बौद्धिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण की गहन व्याख्या का मंच भी बना। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को भारत की आत्मा, चेतना और ऐतिहासिक उत्तरदायित्व से जोड़ना रहा।
राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय का परिसर गंभीर चिंतन, ऐतिहासिक विवेचन और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण दिखाई दिया। कार्यक्रम का शुभारम्भ स्वामी विवेकानन्द की मूर्ति एवं चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ, जिसने सम्पूर्ण वातावरण को श्रद्धा और गरिमा से भर दिया।
कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र के प्रभारी निदेशक डॉ. कृष्ण चन्द पांडेय द्वारा किया गया। उन्होंने अपने वक्तव्य में भारतीय नवजागरण को श्रीरामकृष्ण परमहंस की आध्यात्मिक साधना भूमि से जोड़ते हुए स्वामी विवेकानन्द के जीवन और कार्य को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की प्रस्तावना रखी। डॉ. पांडेय ने कहा कि भारतवर्ष का बौद्धिक और आत्मिक पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि शताब्दियों की ऐतिहासिक प्रक्रिया का निष्कर्ष रहा है।
उन्होंने तराईन के द्वितीय युद्ध का उल्लेख करते हुए बताया कि पृथ्वीराज चौहान की पराजय के साथ ही भारतवर्ष दीर्घकाल तक विदेशी शासन के अधीन चला गया, जिससे उसका सहज स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और आत्मगौरव जड़ता में बंध गया। इसके पश्चात् सोलहवीं शताब्दी में मुगल सत्ता के आगमन से शासन व्यवस्था में स्थिरता तो आई, किंतु आत्मिक पुनर्जागरण का अभाव बना रहा। आगे ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश शासन के दौरान भारत अपनी ही भास्वर पहचान को लगभग विस्मृत करता चला गया।
डॉ. पांडेय ने कहा कि इस ऐतिहासिक जड़ता को तोड़ने के लिए अवतार-कोटि के महापुरुष की आवश्यकता थी, और वह भूमिका श्रीरामकृष्ण परमहंस ने निभाई। श्रीरामकृष्णदेव ने भारतीय ज्ञान, साधना और धर्म परंपरा को अपने जीवन में सिद्ध कर यह प्रमाणित किया कि भारत की आध्यात्मिक शक्ति आज भी जीवित है। उन्होंने धर्म को ग्रंथों से निकालकर जीवन में उतारा और उसी आलोक में जन-जागरण की भूमिका तैयार की।
इसी उद्देश्य से श्रीरामकृष्णदेव ने युवाओं के एक विशिष्ट समूह को चिन्हित किया, जिनमें सर्वप्रमुख नरेंद्रनाथ दत्त थे, जो आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द बने। उन्होंने विवेकानन्द को भारतीय नवजागरण का दायित्व सौंपा, किंतु स्पष्ट किया कि यह कार्य भारतीय धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिकता के आलोक में ही होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने नरेंद्रनाथ को मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक रूप से तैयार किया।
स्वामी विवेकानन्द ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए चार से पाँच वर्षों तक भारत का मौन भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने देश की सामाजिक, आर्थिक और मानसिक दशा को प्रत्यक्ष अनुभव किया। इस भारत-दर्शन ने उन्हें राष्ट्रोद्धार के लिए कृतसंकल्प बना दिया। पूर्णतः तैयार होने के पश्चात् वे अमेरिका गए, जहाँ विश्व धर्म संसद के मंच से उन्होंने भारत की आध्यात्मिक विरासत, वेदान्त, ज्ञान-भक्ति-कर्म के समन्वय और मानवता के सार्वभौमिक संदेश को तेजस्वी स्वर में उद्घोषित किया।
डॉ. पांडेय ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रस्तुत भारत का अतीत, वर्तमान और भविष्य का यही स्वरूप भारतीय नवजागरण का घोषवाक्य बन गया। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि आज के युवाओं को विवेकानन्द के विचारों से प्रेरणा लेकर आत्मबल, चरित्र और राष्ट्रचेतना के साथ आगे बढ़ना होगा।