छत्तीसगढ़ की झील में मिले पराग कणों ने उजागर किया प्राचीन शक्तिशाली मानसून
ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |
छत्तीसगढ़-की-झील-में-मिले-पराग-कण
छत्तीसगढ़ की राजा रानी झील में मिले प्राचीन पराग कणों से वैज्ञानिकों ने भारत में मध्यकालीन शक्तिशाली मानसून के प्रमाण खोजे।
राजा रानी झील के पराग कणों से मध्य भारत में प्राचीन तीव्र मानसून के प्रमाण मिले। अध्ययन से मध्यकालीन जलवायु विसंगति के दौरान गर्म और आर्द्र परिस्थितियों की पुष्टि हुई।
कोरबा/ भारत में मानसून हमेशा से जीवनरेखा रहा है, लेकिन वैज्ञानिक शोध अब इसके प्राचीन स्वरूप की नई कहानी सामने ला रहा है। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित राजा रानी झील से प्राप्त तलछट और पराग कणों के अध्ययन से वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि मध्यकालीन काल में भारत ने आज से कहीं अधिक तीव्र मानसून का अनुभव किया था। यह शोध जलवायु परिवर्तन और भविष्य की वर्षा प्रवृत्तियों को समझने में अहम साबित हो सकता है।
भारत के कोर मानसून ज़ोन में स्थित छत्तीसगढ़ की राजा रानी झील के नीचे छिपे सूक्ष्म पराग कणों ने अतीत के जलवायु इतिहास को नए सिरे से उजागर किया है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान (बीएसआईपी), लखनऊ के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में संकेत मिले हैं कि लगभग 1060 से 1725 ईस्वी के बीच मध्य भारत में अत्यंत शक्तिशाली भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून सक्रिय था।
शोधकर्ताओं ने राजा रानी झील से लगभग 40 सेंटीमीटर लंबा तलछट कोर निकाला, जिसमें करीब 2,500 वर्षों के पर्यावरणीय बदलावों के प्रमाण सुरक्षित पाए गए। इन तलछटी परतों में झील के आसपास उगने वाले प्राचीन पौधों द्वारा छोड़े गए पराग कण मौजूद थे, जो उस समय की वनस्पति और जलवायु परिस्थितियों की जानकारी देते हैं।
परागविज्ञान तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिकों ने इन पराग कणों की पहचान और गणना की। अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि मध्यकालीन जलवायु विसंगति के दौरान नम और शुष्क उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों की प्रजातियाँ प्रमुख थीं। यह स्थिति गर्म, आर्द्र जलवायु और अत्यधिक वर्षा की ओर इशारा करती है। खास बात यह रही कि इस अवधि में कोर मानसून क्षेत्र में किसी भी बड़े शुष्क चरण के प्रमाण नहीं मिले।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तीव्र मानसून मध्यकालीन जलवायु विसंगति (Medieval Climate Anomaly) के कारण था, जो एक वैश्विक गर्म चरण माना जाता है। इस दौरान ला नीना जैसी परिस्थितियाँ, अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का उत्तर की ओर खिसकना, उच्च सौर गतिविधि और सूर्य धब्बों की बढ़ी संख्या ने मानसून को और अधिक मजबूत किया।
अध्ययन यह भी दर्शाता है कि कोर मानसून ज़ोन, जो भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून से देश की लगभग 90 प्रतिशत वर्षा प्राप्त करता है, जलवायु उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहा है। इसलिए इस क्षेत्र से प्राप्त उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले पुराजलवायु रिकॉर्ड भविष्य की जलवायु मॉडलिंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तरह के अध्ययन वर्तमान और भविष्य के मानसून व्यवहार को समझने, वर्षा पैटर्न का अनुमान लगाने और जल संसाधन प्रबंधन से जुड़ी नीतियों को वैज्ञानिक आधार देने में सहायक हो सकते हैं। यह शोध न केवल अतीत की जलवायु को समझने का माध्यम है, बल्कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियों के लिए भी एक मजबूत आधार प्रदान करता है।