स्वामी विवेकानंद: कर्म, करुणा और चेतना का विराट स्वर

Mon 12-Jan-2026,11:42 AM IST +05:30

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स्वामी विवेकानंद: कर्म, करुणा और चेतना का विराट स्वर Swami Vivekanand
  • स्वामी विवेकानंद ने कर्म, सेवा और आत्मविश्वास को धर्म का आधार बताया.

  • शिकागो भाषण से विश्व को भारतीय दर्शन से परिचित कराया.

  • युवाओं को राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति माना.

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / स्वामी विवेकानंद भारत के उन महान चिंतकों और आध्यात्मिक गुरुओं में से हैं जिन्होंने अपने विचारों और कार्यों से न केवल देश को आत्मबोध कराया, बल्कि पूरी दुनिया को भारतीय दर्शन की गहराई से परिचित कराया। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था और उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। बचपन से ही वे जिज्ञासु, तर्कशील और साहसी स्वभाव के थे। उन्होंने पश्चिमी शिक्षा के साथ-साथ भारतीय दर्शन, वेदांत और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया। गुरु रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में आकर उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई। विवेकानंद ने आध्यात्मिकता को केवल साधना या तपस्या तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन और समाज से जोड़ा। उनका मानना था कि सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को निर्भीक, आत्मविश्वासी और सेवा के लिए प्रेरित करे। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि पहले अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचानो, क्योंकि प्रत्येक आत्मा स्वयं में दिव्य है। इसी विचार ने उन्हें एक आध्यात्मिक संन्यासी के साथ-साथ सामाजिक जागरण का अग्रदूत बनाया।

स्वामी विवेकानंद के कार्यों का सबसे प्रभावशाली पक्ष उनका सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण था। 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में उनका ऐतिहासिक भाषण आज भी विश्व इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। “अमेरिका के भाइयों और बहनों” से शुरू हुआ उनका संबोधन केवल शब्द नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा की आवाज था। इस भाषण के माध्यम से उन्होंने दुनिया को बताया कि भारत सहिष्णुता, सर्वधर्म समभाव और मानवता का देश है। इसके बाद उन्होंने अमेरिका और यूरोप में वेदांत दर्शन का प्रचार किया और यह सिद्ध किया कि भारतीय आध्यात्मिकता किसी एक देश या जाति तक सीमित नहीं है। भारत लौटने के बाद उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सेवा को साधना और मानव को ईश्वर मानकर उसकी सेवा करना था। शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत और समाज सुधार के क्षेत्रों में रामकृष्ण मिशन द्वारा किए गए कार्य आज भी उनके विचारों की जीवंत मिसाल हैं। विवेकानंद का विश्वास था कि जब तक देश का अंतिम व्यक्ति दुखी है, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं हो सकता।

स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिकता का मूल तत्व आत्मविश्वास, कर्म और सेवा था। वे भाग्यवाद और पलायनवादी सोच के कट्टर विरोधी थे। उनका कहना था कि उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। उनके लिए आध्यात्मिक जीवन का अर्थ संसार से दूर भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए कर्तव्य निभाना था। वे मानते थे कि हर मनुष्य के भीतर अपार शक्ति है, बस आवश्यकता है उसे जगाने की। उनकी दृष्टि में धर्म वह नहीं जो डर पैदा करे, बल्कि वह है जो मनुष्य को निर्भय बनाए। उन्होंने युवाओं को शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से मजबूत बनने का संदेश दिया, क्योंकि उनके अनुसार युवा ही राष्ट्र की रीढ़ होते हैं। स्वामी विवेकानंद का जीवन स्वयं उनके विचारों का प्रमाण था—संघर्ष, साधना और सेवा का संगम। आज भी उनके विचार शिक्षा, राष्ट्र निर्माण और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची आध्यात्मिकता वही है जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाए और समाज के लिए उपयोगी बनाए।