गाजा बोर्ड ऑफ पीस: ट्रंप ने पुतिन को भेजा न्योता, रूस प्रस्ताव पर कर रहा विचार

Mon 19-Jan-2026,11:54 PM IST +05:30

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गाजा बोर्ड ऑफ पीस: ट्रंप ने पुतिन को भेजा न्योता, रूस प्रस्ताव पर कर रहा विचार Gaza Board of Peace
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America / अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संकट को लेकर बनाई गई अपनी महत्वाकांक्षी ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पहल के तहत रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को इसमें शामिल होने का न्योता भेजा है। इस बात की पुष्टि खुद क्रेमलिन ने की है, हालांकि रूस ने अभी यह साफ नहीं किया है कि पुतिन इस अमेरिकी नेतृत्व वाले मंच का हिस्सा बनेंगे या नहीं। क्रेमलिन का कहना है कि प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है और इस मुद्दे पर वॉशिंगटन से आगे बातचीत की उम्मीद है।

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बताया कि राष्ट्रपति पुतिन को कूटनीतिक माध्यमों से बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का औपचारिक ऑफर मिला है। उन्होंने कहा कि रूस इस प्रस्ताव का बारीकी से अध्ययन कर रहा है और सभी पहलुओं पर स्पष्टता के लिए अमेरिकी पक्ष से संपर्क करेगा। यह बयान ऐसे समय आया है, जब यूक्रेन पर हमले के बाद रूस को पश्चिमी देशों ने कूटनीतिक रूप से काफी हद तक अलग-थलग कर दिया है। ऐसे में ट्रंप का यह कदम वैश्विक राजनीति में एक नया मोड़ माना जा रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप पहले ही भारत, पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की समेत कई देशों को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण दे चुके हैं। बताया जा रहा है कि यह परिषद गाजा शांति योजना के दूसरे चरण के दौरान सक्रिय रूप से काम करना शुरू करेगी। पहला चरण पहले ही पूरा हो चुका है, जिसके तहत अक्टूबर 2025 में इजरायल और हमास के बीच मिस्र, कतर, अमेरिका और तुर्की की मध्यस्थता से बातचीत कराई गई थी। अब ट्रंप इस प्रक्रिया को एक स्थायी अंतरराष्ट्रीय ढांचे में बदलना चाहते हैं।

बोर्ड ऑफ पीस को गाजा के लिए एक ‘अम्ब्रेला ओवरसाइट बॉडी’ के रूप में पेश किया गया है, जिसकी अध्यक्षता खुद डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। इसमें मिडिल ईस्ट और दुनिया के अन्य हिस्सों से कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होंगे। भारत भी इस बोर्ड का हिस्सा है, जिसे ट्रंप प्रशासन क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से अहम मानता है। हालांकि इस पहल को लेकर कई सवाल और आशंकाएं भी उठने लगी हैं।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, एक खत और ड्राफ्ट चार्टर में यह दावा किया गया है कि बोर्ड की अध्यक्षता ट्रंप जीवन भर करेंगे। यही नहीं, इसमें यह भी उल्लेख है कि सदस्य देशों का कार्यकाल तीन साल का होगा और स्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए कथित तौर पर एक बिलियन डॉलर का भुगतान करना होगा। इन प्रावधानों ने अंतरराष्ट्रीय राजनयिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है। कई विशेषज्ञों और राजनयिकों का मानना है कि इस तरह की संरचना संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और प्रभाव को कमजोर कर सकती है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस में उन देशों को भी शामिल होने का न्योता दिया है, जिनके विचार और हित आपस में टकराते हैं। तुर्की, मिस्र और पाकिस्तान जैसे देश इजरायल का खुलकर विरोध करते हैं और हमास के प्रति सहानुभूति रखते हैं। वहीं, इजरायल ने खुद ट्रंप के इस प्रस्ताव का विरोध किया है। अब रूस को भी इस मंच पर आमंत्रित किया गया है, जिससे वैचारिक और राजनीतिक मतभेद और गहरे हो सकते हैं।

ऐसे में आलोचकों का कहना है कि परस्पर विरोधी सोच और एजेंडे वाले देशों को एक ही मंच पर लाना शांति से ज्यादा भ्रम पैदा कर सकता है। ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस फिलहाल एक महत्वाकांक्षी लेकिन विवादास्पद प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है, जिसके सफल होने या विफल होने का फैसला आने वाला वक्त ही करेगा।