रायपुर में डॉक्टरों की असमान तैनाती से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित

Mon 16-Feb-2026,05:06 PM IST +05:30

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रायपुर में डॉक्टरों की असमान तैनाती से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित Raipur-PHC-CHC-Doctor-Shortage-Crisis
  • रायपुर जिले में PHC और CHC में डॉक्टरों की असमान तैनाती से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं।

  • स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने प्राथमिकता आधारित पुनर्विन्यास और पारदर्शी नीति लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

Chhattisgarh / Raipur :

Raipur/ प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से आम लोगों तक सस्ती और सुलभ चिकित्सा सेवाएं पहुंचाने का दावा किया जाता है, लेकिन रायपुर जिले में जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। डॉक्टरों की तैनाती में भारी असमानता के कारण कई स्वास्थ्य केंद्रों में जरूरत से ज्यादा चिकित्सक मौजूद हैं, जबकि कई महत्वपूर्ण केंद्र डॉक्टर विहीन हैं। इसका सीधा असर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों पर पड़ रहा है।

रायपुर जिले के विभिन्न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में डॉक्टरों की पदस्थापना में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। छोटे रोगों के इलाज के लिए स्थानीय स्तर पर सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इन केंद्रों की स्थापना की गई थी, लेकिन पर्याप्त डॉक्टरों की कमी से मरीजों को जिला अस्पताल या निजी क्लीनिकों का रुख करना पड़ रहा है।

नवा रायपुर के राखी क्षेत्र में प्रस्तावित 100 बेड वाले अस्पताल (वर्तमान में 50 बेड संचालित) में पांच चिकित्सा अधिकारी और सात संविदा डॉक्टर तैनात हैं। इसके विपरीत, सरोना स्थित 100 बेड अस्पताल में सभी 15 स्वीकृत पद खाली हैं। धरसींवा CHC में 14 स्वीकृत पदों में से केवल 6 डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि अभनपुर CHC में 16 पदों के मुकाबले महज 2 चिकित्सक सेवाएं दे रहे हैं।

मंदिर हसौद CHC में भी स्थायी डॉक्टरों की कमी के चलते संविदा डॉक्टरों के भरोसे काम चल रहा है। वहीं बिरगांव CHC में तीन पदों में से केवल एक डॉक्टर मौजूद है। आरंग में तीन पदों के मुकाबले दो डॉक्टर तैनात हैं, जबकि परसदा, मानिकचौरी, उपरवारा, तोरला और खोरपा जैसे कई केंद्र पूरी तरह डॉक्टर विहीन हैं।

विशेष अस्पतालों की स्थिति भी चिंताजनक है। पंड़री स्थित लेप्रोसी होम एंड हॉस्पिटल में डॉक्टरों के पद स्वीकृत ही नहीं हैं। मानसिक चिकित्सालय में 12 पद स्वीकृत होने के बावजूद एक भी नियमित डॉक्टर कार्यरत नहीं है। दूसरी ओर, शहरी और वीआईपी क्षेत्रों की डिस्पेंसरी में निर्धारित संख्या के अनुसार डॉक्टरों की तैनाती सुनिश्चित की गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डॉक्टरों का पुनर्विन्यास प्राथमिकता के आधार पर नहीं किया गया, तो ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं और कमजोर होंगी। संतुलित पदस्थापना और पारदर्शी नीति ही इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकती है।