विश्व ब्रेल दिवस 2026: भारती ब्रेल के जरिए समावेशी शिक्षा को भारत की नई मजबूती
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भारत ने भारती ब्रेल के मानकीकरण और यूनिकोड मैपिंग से दृष्टिबाधितों के लिए डिजिटल और शैक्षणिक समावेशन को नई मजबूती दी।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 और एनईपी 2020 ने ब्रेल को शिक्षा और सार्वजनिक पहुँच का कानूनी आधार बनाया।
सुगम्य भारत अभियान और डिजिटल पुस्तकालयों ने ब्रेल को शिक्षा से आगे सार्वजनिक जीवन से जोड़ा।
दिल्ली/ हर वर्ष 4 जनवरी को मनाया जाने वाला विश्व ब्रेल दिवस 2026 में भारत के लिए विशेष महत्व लेकर आया है। नई दिल्ली सहित पूरे देश में यह दिवस दृष्टिबाधित व्यक्तियों के अधिकार, शिक्षा और समावेश की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। भारत सरकार द्वारा भारती ब्रेल के मानकीकरण, डिजिटल यूनिकोड मैपिंग और सुलभ शिक्षा नीतियों के माध्यम से यह दिवस केवल जागरूकता तक सीमित न रहकर नीति और व्यवहार में बदलाव का प्रतीक बन गया है।
विश्व ब्रेल दिवस केवल एक प्रतीकात्मक अवसर नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष, सशक्तिकरण और समान अवसर की कहानी है, जिसे दृष्टिबाधित समुदाय प्रतिदिन जीता है। भारत में 4 जनवरी 2026 को मनाया गया विश्व ब्रेल दिवस इस बात का प्रमाण बना कि ब्रेल अब केवल पढ़ने-लिखने की प्रणाली नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा में समानता और गरिमापूर्ण जीवन का आधार बन चुकी है।
ब्रेल लिपि का भारत में प्रवेश वर्ष 1887 में हुआ था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद 1951 में भारती ब्रेल को राष्ट्रीय मानक के रूप में अपनाया गया। यह निर्णय इसलिए ऐतिहासिक था क्योंकि इसने विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए एक साझा स्पर्शजन्य कोड उपलब्ध कराया। आज, डिजिटल युग में, ब्रेल का यह स्वरूप तकनीक से जुड़कर नए आयाम गढ़ रहा है।
भारत में दृष्टिबाधितों की वास्तविकता और चुनौती
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 50 लाख से अधिक दृष्टिबाधित व्यक्ति हैं। इनकी सबसे बड़ी चुनौती केवल दृष्टि की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और सूचना तक सीमित पहुँच रही है। लंबे समय तक ब्रेल को सहायक साधन के रूप में देखा गया, लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने इसे अधिकार-आधारित ढांचे में परिवर्तित किया है।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) ने ब्रेल को कानूनी संरक्षण प्रदान किया। यह अधिनियम न केवल समावेशी शिक्षा को अनिवार्य बनाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि दृष्टिबाधित छात्रों को ब्रेल और सुलभ प्रारूपों में पाठ्यपुस्तकें, सहायक उपकरण और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाए।
ब्रेल क्या है और यह कैसे कार्य करती है
ब्रेल एक स्पर्शजन्य लेखन और पठन प्रणाली है, जो छह बिंदुओं वाले सेल पर आधारित होती है। इन बिंदुओं के विभिन्न संयोजन अक्षरों, अंकों, विराम चिह्नों और गणितीय प्रतीकों को दर्शाते हैं। ब्रेल स्वयं में कोई भाषा नहीं है, बल्कि यह भाषाओं को पढ़ने और लिखने का माध्यम है।
इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह दृष्टिबाधित व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से पढ़ने, लिखने और सोचने की क्षमता प्रदान करती है। यही कारण है कि ब्रेल को साक्षरता का मूल आधार माना जाता है।
भारती ब्रेल: भारत की मानकीकृत पहचान
भारत सरकार ने भारती ब्रेल को सभी भारतीय भाषाओं के लिए एकीकृत प्रणाली के रूप में विकसित किया है। 4 जनवरी 2025 को मानक भारती ब्रेल कोड (यूनिकोड मैपिंग सहित) प्रकाशित किया गया, जिससे डिजिटल ब्रेल कंटेंट, स्क्रीन रीडर और ब्रेल डिस्प्ले के साथ संगतता सुनिश्चित हुई।
यूनिकोड मैपिंग का अर्थ है कि प्रत्येक ब्रेल पैटर्न को एक डिजिटल कोड मिला है। इससे वेबसाइट, ई-बुक्स, सरकारी पोर्टल और मोबाइल एप्लिकेशन दृष्टिबाधितों के लिए अधिक सुलभ हो सके हैं। यह पहल ‘डिजिटल इंडिया’ को वास्तविक अर्थों में समावेशी बनाती है।
हालिया पहलें और ब्रेल 2.1 का मसौदा
राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (NIEPVD) ने भारती ब्रेल 2.1 का मसौदा तैयार किया है, जिसे 4 जनवरी 2026 को सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया। इस मसौदे को शिक्षकों, ब्रेल विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और तकनीकी डेवलपर्स से प्राप्त सुझावों के आधार पर अंतिम रूप दिया जाएगा।
इसके साथ ही, तमिल, मलयालम, ओडिया जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में ब्रेल प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर साक्षरता को बढ़ावा मिले।
सुगम्य भारत अभियान और ब्रेल की भूमिका
2015 में शुरू किया गया सुगम्य भारत अभियान देश को बाधा-मुक्त बनाने की राष्ट्रीय पहल है। इसके तहत सरकारी भवनों, रेलवे स्टेशनों, मेट्रो, हवाई अड्डों और वेबसाइटों को सुलभ बनाया जा रहा है। 2,000 से अधिक रेलवे स्टेशनों पर ब्रेल संकेत लगाए जा चुके हैं।
यह अभियान ब्रेल को केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रखता, बल्कि सार्वजनिक सेवाओं, परिवहन और सूचना प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बनाता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और ब्रेल
एनईपी 2020 स्पष्ट रूप से कहती है कि समावेशी शिक्षा केवल नाममात्र की नहीं हो सकती। इसके लिए बड़े प्रिंट, ब्रेल और डिजिटल सुलभ सामग्री अनिवार्य है। एनसीईआरटी को ब्रेल और सुलभ प्रारूपों में पाठ्यपुस्तकें विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
इस नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा केवल अक्षमता के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।
उच्च शिक्षा और डिजिटल पुस्तकालय
उच्च शिक्षा में प्रवेश करने वाले दृष्टिबाधित छात्रों के लिए ‘सुगम्य पुस्तकालय’ एक महत्वपूर्ण पहल है। NIEPVD, TCS और Daisy Forum के सहयोग से विकसित यह डिजिटल लाइब्रेरी ब्रेल और ऑडियो प्रारूप में पुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित करती है।
इसके अलावा, DALM परियोजना के तहत अब तक 1.69 लाख से अधिक छात्रों को मुफ्त ब्रेल पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराई जा चुकी हैं।
क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण
ब्रेल की गुणवत्ता और मानकीकरण बनाए रखने के लिए NIEPVD और भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) जैसे संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। RCI पुनर्वास और विशेष शिक्षा से जुड़े प्रोफेशनल्स के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित करता है और प्रशिक्षण की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।
समानता की ओर बढ़ता भारत
विश्व ब्रेल दिवस 2026 यह स्पष्ट संदेश देता है कि भारत अब ब्रेल को दया या सहायता के नजरिए से नहीं, बल्कि अधिकार और समानता के माध्यम के रूप में देख रहा है। कानून, नीति, तकनीक और संस्थागत सहयोग के माध्यम से ब्रेल भारत के समावेशी भविष्य की नींव बन रही है। सूचना तक पहुँच अब विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक मूल अधिकार के रूप में स्थापित हो रही है।