उच्च शिक्षा परिसरों में समानता की नई राह: जाति-आधारित भेदभाव रोकने के लिए UGC के कड़े नियम लागू

Tue 20-Jan-2026,04:35 PM IST +05:30

ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |

Follow Us

उच्च शिक्षा परिसरों में समानता की नई राह: जाति-आधारित भेदभाव रोकने के लिए UGC के कड़े नियम लागू UGC Guideline 2026
  • UGC के 2026 विनियमों से उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को कानूनी मजबूती.

  • EOC और इक्विटी कमेटी के जरिए शिकायत निवारण और निगरानी अनिवार्य.

  • नियम उल्लंघन पर संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान.

Delhi / Delhi :

Delhi / प्रारंभिक परीक्षा से जुड़ाव: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, लोकनीति, अधिकारों से जुड़े मुद्दे, सामाजिक विकास मुख्य परीक्षा से जुड़ाव (GS–2): अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा के लिए तंत्र, विधि व संस्थान; स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव संसाधनों से जुड़े सामाजिक क्षेत्र

देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में लंबे समय से जाति-आधारित भेदभाव को लेकर उठते सवालों और छात्रों की शिकायतों के बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने एक अहम कदम उठाया है। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 के जरिए आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि अब परिसरों में भेदभाव केवल नैतिक या सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक दंडनीय संस्थागत चूक होगी। नए नियमों के तहत प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज में समान अवसर केंद्र (EOC) तथा उसके अंतर्गत इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य कर दिया गया है। नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को डिग्री या कार्यक्रम संचालित करने से रोकने तक की सख्त कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

नई नियमावली की आवश्यकता क्यों पड़ी:
UGC के अनुसार ये विनियम वर्ष 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप हैं। बीते वर्षों में उच्च शिक्षा परिसरों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव, बहिष्कार और संस्थागत उदासीनता के कई मामले सामने आए। फरवरी 2025 में आयोग ने इन नियमों का मसौदा सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था, लेकिन उस पर गंभीर आपत्तियाँ उठीं। मसौदे में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा से बाहर रखा गया था और भेदभाव की व्याख्या भी अस्पष्ट मानी गई। इसके अलावा, झूठी शिकायतों को ‘हतोत्साहित’ करने के नाम पर जुर्माने का प्रस्ताव भी आलोचना के घेरे में आया। सार्वजनिक विमर्श और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया के बाद UGC ने अंतिम अधिसूचित नियमों में कई अहम बदलाव किए। OBC को स्पष्ट रूप से जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल किया गया और झूठी शिकायतों से जुड़े दंडात्मक प्रावधान हटा दिए गए। इससे यह संदेश गया कि आयोग शिकायतकर्ताओं को डराने के बजाय संस्थानों को जवाबदेह बनाना चाहता है।

जाति-आधारित भेदभाव की नई परिभाषा:
नवीन विनियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार केवल जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ किया गया कोई भी भेदभाव इस श्रेणी में आएगा।
इसके साथ ही ‘भेदभाव’ की व्यापक परिभाषा दी गई है, जिसमें किसी भी हितधारक के खिलाफ धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता या इनसे जुड़े किसी भी आधार पर किया गया प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार शामिल होगा। यह परिभाषा वर्ष 2012 के विनियमों की उस भावना को आगे बढ़ाती है, जिसमें कहा गया था कि ऐसा कोई भी भेद, बहिष्कार या प्राथमिकता जो शिक्षा में समान व्यवहार को बाधित करे और मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हो, भेदभाव माना जाएगा।

किन प्रावधानों को शामिल नहीं किया गया:
हालाँकि नई परिभाषा में 2012 के दो विशिष्ट प्रावधानों को शामिल नहीं किया गया है। पहला, वह प्रावधान जो संस्थानों को जाति, धर्म, भाषा या लिंग के आधार पर अलग शैक्षणिक प्रणाली या संस्थान बनाए रखने से रोकता था। दूसरा, प्रवेश और स्वीकृति प्रक्रिया में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के खिलाफ आठ अलग-अलग प्रकार के भेदभाव का स्पष्ट उल्लेख। विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रावधानों की अनुपस्थिति से कुछ व्यावहारिक अस्पष्टताएँ बनी रह सकती हैं, हालाँकि समग्र ढाँचा पहले की तुलना में अधिक सशक्त है।

समान अवसर केंद्र और इक्विटी कमेटी की भूमिका:
नए नियमों की सबसे अहम विशेषता प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र (EOC) की अनिवार्यता है। EOC का उद्देश्य केवल शिकायत निवारण नहीं, बल्कि परिसर में समानता, समावेशन और संवेदनशीलता की संस्कृति विकसित करना है।

EOC के अंतर्गत गठित इक्विटी कमेटी की अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। कमेटी में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है, ताकि निर्णय प्रक्रिया में विविध दृष्टिकोण शामिल हों। इक्विटी कमेटी को वर्ष में कम-से-कम दो बार बैठक करनी होगी और EOC को अपनी अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट तैयार करनी होगी। इसके अलावा, प्रत्येक संस्थान को EOC की कार्यप्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट UGC को भेजनी होगी, जिससे निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।

राष्ट्रीय स्तर की निगरानी व्यवस्था: नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए UGC एक राष्ट्रीय निगरानी समिति का गठन करेगा। इस समिति में वैधानिक पेशेवर परिषदों, आयोगों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ नागरिक समाज के सदस्य भी शामिल होंगे। समिति वर्ष में कम-से-कम दो बार बैठक करेगी, नियमों के पालन की समीक्षा करेगी, भेदभाव से जुड़े मामलों की जाँच करेगी और रोकथाम के उपाय सुझाएगी। यह व्यवस्था पहली बार उच्च शिक्षा में समानता से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित निगरानी के दायरे में लाती है।

संस्थानों की जिम्मेदारी और दंड का प्रावधान: नवीन विनियमों में संस्थानों पर स्पष्ट जिम्मेदारी तय की गई है कि वे भेदभाव को समाप्त करने, समानता को बढ़ावा देने और उपयुक्त सुधारात्मक उपाय करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएँ। संस्थान के प्रमुख को नियमों के अनुपालन की पूर्ण जिम्मेदारी दी गई है।

यदि कोई संस्थान नियमों का पालन नहीं करता, तो UGC के पास कड़े दंडात्मक अधिकार होंगे। ऐसे संस्थानों को UGC की योजनाओं से वंचित किया जा सकता है, डिग्री, डिस्टेंस लर्निंग या ऑनलाइन कार्यक्रम संचालित करने से रोका जा सकता है और गंभीर मामलों में UGC की सूची से हटाया भी जा सकता है। यह प्रावधान संस्थानों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि समानता अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य मानक है।

UGC की भूमिका और व्यापक प्रभाव: 1956 में संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग देश में विश्वविद्यालय शिक्षा के समन्वय, मानक निर्धारण और विकास का प्रमुख निकाय है। अनुदान देने के साथ-साथ नीतिगत सलाह और नियमन UGC की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल हैं। नई नियमावली के जरिए आयोग ने यह संकेत दिया है कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता केवल अकादमिक उत्कृष्टता से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशन से भी तय होगी।

UGC के 2026 के विनियम उच्च शिक्षा परिसरों में समानता की दिशा में एक निर्णायक कदम माने जा रहे हैं। OBC को भेदभाव के दायरे में शामिल करना, इक्विटी कमेटियों की अनिवार्यता और सख्त दंडात्मक प्रावधान यह दर्शाते हैं कि अब भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। हालाँकि कुछ प्रावधानों की अनुपस्थिति पर बहस जारी है, फिर भी यह नियमावली संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप एक समावेशी और संवेदनशील शिक्षा प्रणाली की नींव रखने की कोशिश है। आने वाले समय में इन नियमों का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संस्थान इन्हें कितनी ईमानदारी और गंभीरता से लागू करते हैं।