पंजाब राजनीति में बड़ा फेरबदल: अरविंद खन्ना अकाली दल में शामिल, बीजेपी को झटका
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Punjab Political News
अरविंद खन्ना ने अकाली दल जॉइन किया.
सुखबीर बादल खुद धूरी पहुंचे.
मालवा क्षेत्र में बदल सकते हैं सियासी समीकरण.
Punjab / पंजाब की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच संभावित गठबंधन की चर्चाओं के बीच अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने ऐसा कदम उठाया है, जिसे बीजेपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। सुखबीर बादल खुद संगरूर जिले के धूरी इलाके पहुंचे और बीजेपी के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक अरविंद खन्ना को अकाली दल में शामिल कराया।
इस जॉइनिंग को साधारण राजनीतिक घटना नहीं माना जा रहा। अरविंद खन्ना पंजाब बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुके हैं और राज्य की राजनीति में उनका खासा प्रभाव रहा है। वे पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी नेताओं में भी गिने जाते रहे हैं। ऐसे में उनका अकाली दल में शामिल होना आने वाले समय में सियासी समीकरणों को बदल सकता है, खासकर मालवा क्षेत्र में।
अरविंद खन्ना की पहचान सिर्फ एक राजनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक बड़े उद्योगपति और समाजसेवी के तौर पर भी रही है। उन्होंने ‘उम्मीद फाउंडेशन’ के जरिए संगरूर और आसपास के इलाकों में कई सामाजिक कार्य किए। शिक्षा, स्वास्थ्य और जरूरतमंदों की मदद के क्षेत्र में उनके काम ने उन्हें स्थानीय स्तर पर मजबूत जनाधार दिलाया। यही सामाजिक आधार उनके राजनीतिक करियर की बड़ी ताकत बना।
उनका सियासी सफर 2002 में शुरू हुआ, जब उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर संगरूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद 2004 में लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया, हालांकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2012 में उन्होंने धूरी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और एकतरफा जीत दर्ज की। इस जीत ने उन्हें मालवा क्षेत्र के प्रभावशाली नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया।
हालांकि, 2012 के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा में बड़ा मोड़ आया। कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने में असफल रही और इस परिणाम से निराश होकर अरविंद खन्ना ने मात्र दो साल बाद ही विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली, अपना कारोबार और ‘उम्मीद फाउंडेशन’ तक बंद कर दिया और शहर छोड़ दिया। यह फैसला उस समय काफी चौंकाने वाला माना गया था।
अब कई वर्षों बाद उनकी वापसी अकाली दल के साथ हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि खन्ना की वापसी और उनका अकाली दल में शामिल होना पंजाब की सियासत में नए समीकरण पैदा कर सकता है। खासतौर पर उस समय, जब अकाली दल और बीजेपी के बीच रिश्तों को लेकर नई संभावनाएं तलाश की जा रही हैं।
अरविंद खन्ना की नई पारी कितनी प्रभावशाली साबित होगी, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि उनकी एंट्री ने पंजाब की राजनीति में नई चर्चा और हलचल जरूर पैदा कर दी है।