सुसाइड नोट में छलका तीन बहनों का दर्द, बढ़ती कोरियन दीवानगी पर गंभीर सवाल
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सुसाइड नोट में तीनों बहनों ने पढ़ाई के दबाव, परिवार की उम्मीदों और कोरियन ड्रामा की लत से पैदा हुए मानसिक तनाव को अपनी परेशानी का कारण बताया।
तीनों बहनों ने स्वीकार किया कि वे वास्तविक जीवन और कोरियन फैंटेसी दुनिया के बीच संतुलन नहीं बना पा रही थीं, जिससे अवसाद गहराता गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं में डिजिटल कंटेंट की दीवानगी मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर रही है, जिससे ऐसी घटनाएँ बढ़ रही हैं।
Delhi / तीन बहनों द्वारा छोड़ा गया सुसाइड नोट समाज और परिवार दोनों के लिए एक गहरी चेतावनी बनकर सामने आया है। यह मामला उस मानसिक दबाव और डिजिटल लत की ओर इशारा करता है, जो आज के युवाओं में तेजी से बढ़ रही है। पुलिस के अनुसार, तीनों बहनों ने घर में फांसी लगाकर अपनी जान दी और पीछे एक ऐसा नोट छोड़ दिया जिसने हर किसी को झकझोर दिया।
सुसाइड नोट में तीनों बहनों ने स्वीकार किया कि वे लंबे समय से मानसिक तनाव में थीं। पढ़ाई में प्रदर्शन, परिवार की उम्मीदें और भविष्य को लेकर बढ़ती चिंता ने उनके भीतर गहरा अवसाद पैदा कर दिया था। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उन्होंने अपने नोट में ‘कोरियन ड्रामा और के-कल्चर’ की दीवानगी को भी अपनी हालत बिगड़ने का बड़ा कारण बताया।
तीनों बहनों ने लिखा कि वे कोरियन ड्रामा की काल्पनिक दुनिया को अपनी वास्तविक जिंदगी से ज्यादा आकर्षक मानने लगी थीं। उन्होंने नोट में लिखा कि कोरियन कंटेंट की वजह से वे अपनी कल्पनाओं में खोती जा रही थीं, और वास्तविकता से सामंजस्य बिठा नहीं पा रही थीं। लगातार स्क्रीन टाइम और भावनात्मक रूप से प्रभाव डालने वाले कंटेंट ने उन्हें मानसिक रूप से अस्थिर कर दिया।
परिवार के सदस्यों का मानना है कि तीनों बहनें बेहद शांत स्वभाव की थीं और ज्यादातर समय अपने कमरे में रहती थीं। वे मोबाइल फोन और कोरियन शो में डूबी रहती थीं। धीरे–धीरे वे परिवार से दूर होती चली गईं, लेकिन किसी ने यह अंदाजा नहीं लगाया कि स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है।
इस दर्दनाक घटना के बाद मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों ने युवा पीढ़ी में डिजिटल कंटेंट की लत को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि कई बार युवा काल्पनिक पात्रों और स्क्रीन पर दिखने वाली चमकदार दुनिया को अपने वास्तविक जीवन से तुलना करने लगते हैं, जो मानसिक असंतुलन, अवसाद और आत्मघाती विचारों तक ले जा सकता है।
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि बच्चों और किशोरों के व्यवहार में अचानक आने वाले बदलावों को हल्के में न लें। समय पर बातचीत और भावनात्मक सहयोग कई ज़िंदगियाँ बचा सकता है।