अनूपपुर में खुले आसमान के नीचे पढ़ाई

Tue 03-Feb-2026,04:02 PM IST +05:30

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अनूपपुर में खुले आसमान के नीचे पढ़ाई Anuppur-Bartola-Primary-School-Open-Sky-Education-Crisis
  • बरटोला प्राथमिक स्कूल बिना भवन संचालित, खुले मैदान में पढ़ने को मजबूर आदिवासी बच्चे, शिक्षा व्यवस्था की गंभीर लापरवाही उजागर।

  • पीने के पानी, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य दोनों पर पड़ रहा नकारात्मक असर।

Madhya Pradesh / Anuppur :

Madhya Pradesh/ मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले की लखौरा ग्राम पंचायत स्थित बरटोला प्राथमिक स्कूल की स्थिति शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर कर रही है। जिस उम्र में बच्चों को सुरक्षित भवन, स्वच्छ पानी और बुनियादी सुविधाओं के साथ शिक्षा मिलनी चाहिए, वहां ये नौनिहाल खुले मैदान में पढ़ने को मजबूर हैं। दो साल पहले स्कूल भवन को जर्जर बताकर गिरा दिया गया, लेकिन नई इमारत आज तक कागजों से बाहर नहीं निकल सकी।

बरटोला प्राथमिक स्कूल इन दिनों एक स्कूल से अधिक अस्थायी व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है। स्कूल परिसर में न तो पक्की इमारत है और न ही बच्चों के बैठने के लिए समुचित व्यवस्था। शिक्षक बच्चों को खुले मैदान में पढ़ाने को विवश हैं, जहां मौसम की मार सीधी बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रही है।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2023 में स्कूल भवन को जर्जर घोषित कर गिराने के आदेश जारी किए गए थे। भवन को डिस्मेंटल कर दिया गया, लेकिन इसके बाद नए निर्माण की प्रक्रिया प्रशासनिक फाइलों में उलझकर रह गई। न तो टेंडर प्रक्रिया पूरी हुई और न ही निर्माण की कोई समय-सीमा तय की गई।

बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। कभी ग्रामीणों के घर तो कभी अस्थायी छप्पर के नीचे कक्षाएं संचालित की जाती हैं। तेज धूप और ठंड के दौरान बच्चों का स्वास्थ्य भी खतरे में पड़ता है। खुले मैदान में पढ़ाई के कारण न केवल एकाग्रता प्रभावित होती है, बल्कि दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती है। विद्यालय में पीने के पानी की स्थायी व्यवस्था भी नहीं है। परिसर में मौजूद हैंडपंप से पानी नहीं निकलता, जिससे बच्चों को प्यास बुझाने के लिए दूर जाना पड़ता है। स्वच्छ जल के अभाव में बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।

इस स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चे आदिवासी समुदाय से हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन की उदासीनता कहीं न कहीं सामाजिक उपेक्षा को दर्शाती है। उनका कहना है कि यदि यह स्कूल किसी शहरी क्षेत्र में होता, तो अब तक नई इमारत बन चुकी होती। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, विधायक का निवास कुछ किलोमीटर की दूरी पर होने के बावजूद स्कूल की बदहाली पर कोई ठोस पहल नहीं की गई। सांसद स्तर पर भी अब तक कोई हस्तक्षेप नजर नहीं आया।

शिक्षा का अधिकार कानून और करोड़ों रुपये के शिक्षा बजट के दावों के बीच बरटोला प्राथमिक स्कूल की स्थिति सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करती है। अब देखना यह है कि प्रशासन कब जागता है और इन नौनिहालों को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा का अधिकार मिल पाता है या नहीं।