डिजिटल युग में बाल विवाह की नई चुनौती: इंटरनेट, सोशल मीडिया और समाधान की तलाश
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सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से किशोरों के रिश्तों में बदलाव, कई मामलों में कम उम्र में विवाह के निर्णय और बाल विवाह की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई।
विशेषज्ञों ने डिजिटल साक्षरता, अभिभावक संवाद और जागरूकता को समाधान बताया, तकनीक को दोष देने के बजाय सही उपयोग पर जोर दिया।
Delhi/ तकनीक और इंटरनेट ने आज दुनिया को तेजी से बदल दिया है। शिक्षा, रोजगार, संवाद और सामाजिक जुड़ाव के नए रास्ते खुले हैं, लेकिन इसके साथ कुछ नई सामाजिक चुनौतियां भी सामने आई हैं। बाल विवाह जैसी पुरानी कुरीति अब डिजिटल युग में नए रूप में दिखाई देने लगी है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने किशोरों के बीच संपर्क और संबंधों के अवसर बढ़ाए हैं, जिसके कारण कई बार कम उम्र में विवाह की घटनाएं सामने आ रही हैं।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा किए गए एक शोध में यह सामने आया कि दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्रों में किशोरों के बीच होने वाले बाल विवाह में सोशल मीडिया की भूमिका भी देखने को मिल रही है। नेपाल में 1400 किशोरों से बातचीत के आधार पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि बाल विवाह करने वाले लगभग एक तिहाई किशोरों की पहली मुलाकात सोशल मीडिया के माध्यम से हुई थी। इसका मतलब यह है कि डिजिटल माध्यम केवल जानकारी और मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह किशोरों के सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार माता-पिता अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों को ठीक से समझ नहीं पाते। इंटरनेट और सोशल मीडिया की दुनिया उनके लिए अपेक्षाकृत नई होती है। ऐसे में जब उन्हें यह लगता है कि उनके बच्चे किसी ऑनलाइन संबंध में हैं या किसी प्रकार का जोखिम हो सकता है, तो वे परिवार की प्रतिष्ठा या सुरक्षा के नाम पर जल्दी शादी करने का निर्णय ले लेते हैं। यह स्थिति खास तौर पर उन समाजों में ज्यादा देखी जाती है जहां सामाजिक दबाव और पारिवारिक मान-सम्मान को बहुत महत्व दिया जाता है।
इसके अलावा इंटरनेट पर बढ़ती छेड़छाड़, ऑनलाइन उत्पीड़न, फर्जी पहचान और ब्लैकमेलिंग जैसी समस्याएं भी किशोरियों के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं। कई मामलों में लड़कियों को डराया या बदनाम करने की धमकी दी जाती है, जिससे परिवार जल्दी विवाह को ही सुरक्षित विकल्प समझ लेता है। इस प्रकार डिजिटल जोखिम अप्रत्यक्ष रूप से बाल विवाह की समस्या को बढ़ा सकते हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केवल तकनीक को दोष देना या बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच को सीमित कर देना इस समस्या का प्रभावी समाधान नहीं है। इंटरनेट आज शिक्षा, जानकारी और सामाजिक जागरूकता का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। यदि बच्चों को पूरी तरह डिजिटल दुनिया से दूर कर दिया जाए तो वे सीखने और अपने भविष्य के अवसरों से भी वंचित हो सकते हैं।
यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और शोधकर्ताओं ने डिजिटल साक्षरता को इस समस्या के समाधान का महत्वपूर्ण साधन बताया है। बांग्लादेश में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि रोहिंज्या शरणार्थी समुदाय के 30 प्रतिशत से अधिक किशोरों ने सोशल मीडिया के माध्यम से ही बाल विवाह के नुकसान और उसके सामाजिक प्रभावों के बारे में जानकारी प्राप्त की थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि वही डिजिटल मंच, जो कभी जोखिम का कारण बनता है, जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम भी बन सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार परिवार, स्कूल और समाज को मिलकर किशोरों के डिजिटल जीवन को समझने की जरूरत है। अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए और उन्हें सुरक्षित इंटरनेट उपयोग के बारे में मार्गदर्शन देना चाहिए। स्कूलों में भी डिजिटल सुरक्षा और ऑनलाइन व्यवहार से जुड़ी शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है।
सरकारों और सामाजिक संगठनों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग जागरूकता अभियानों, शिक्षा कार्यक्रमों और किशोरों को सशक्त बनाने के लिए किया जाए, तो बाल विवाह की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
डिजिटल युग में यह समझना जरूरी है कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है। असली चुनौती यह है कि समाज इसे किस तरह इस्तेमाल करता है। यदि इंटरनेट को ज्ञान, संवाद और जागरूकता के माध्यम के रूप में उपयोग किया जाए, तो यह बाल विवाह जैसी कुरीतियों को खत्म करने में एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है।