Captain Lakshmi Sahgal Death Anniversary: आज़ाद हिंद फ़ौज की वीरांगना को श्रद्धांजलि

Thu 23-Jul-2026,04:20 PM IST +05:30

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Captain Lakshmi Sahgal Death Anniversary: आज़ाद हिंद फ़ौज की वीरांगना को श्रद्धांजलि Captain Lakshmi Sahgal Death Anniversary
  • कैप्टन लक्ष्मी सहगल आज़ाद हिंद फ़ौज की रानी झांसी रेजिमेंट की पहली महिला कमांडर थीं।

  • उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ जीवनभर चिकित्सा सेवा और समाजसेवा को समर्पित किया।

  • उनकी पुण्यतिथि पर देश उनके साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपने साहस, त्याग और सेवा से आने वाली पीढ़ियों के लिए अमिट प्रेरणा छोड़ी। कैप्टन लक्ष्मी सहगल ऐसा ही एक नाम है। वे केवल आज़ाद हिंद फ़ौज की महिला अधिकारी ही नहीं थीं, बल्कि एक संवेदनशील चिकित्सक, समाजसेवी, महिला अधिकारों की समर्थक और जनसेवा को जीवन का उद्देश्य मानने वाली असाधारण व्यक्तित्व थीं। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्ची देशभक्ति केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं होती, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग के साथ खड़े रहने में भी दिखाई देती है।

24 अक्टूबर 1914 को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में जन्मी लक्ष्मी सहगल का मूल नाम लक्ष्मी स्वामीनाथन था। उनके पिता एस. स्वामीनाथन प्रसिद्ध वकील थे, जबकि उनकी माता अम्मू स्वामीनाथन स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता थीं। बचपन से ही उन्हें राष्ट्रप्रेम, सामाजिक समानता और न्याय के संस्कार मिले। यही कारण था कि कम उम्र में ही वे स्वदेशी आंदोलन और स्वतंत्रता की विचारधारा से प्रभावित हो गईं।

उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की और स्त्री रोग एवं प्रसूति विज्ञान में विशेषज्ञता हासिल की। डॉक्टर बनने के बाद उन्होंने कुछ समय तक सरकारी अस्पताल में सेवाएँ दीं। चिकित्सा उनके लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा का माध्यम थी। इसी भावना के साथ वे 1940 में सिंगापुर चली गईं, जहाँ उन्होंने भारतीय प्रवासियों और जरूरतमंद लोगों का उपचार शुरू किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सिंगापुर का राजनीतिक और सैन्य परिदृश्य तेजी से बदला। जब ब्रिटिश शासन कमजोर पड़ा और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) को नया नेतृत्व दिया, तब लक्ष्मी सहगल ने बिना किसी हिचकिचाहट के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्णय लिया। नेताजी की उस ऐतिहासिक घोषणा ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया, जिसमें महिलाओं की एक सैन्य रेजिमेंट बनाने की बात कही गई थी।

लक्ष्मी सहगल ने सैकड़ों महिलाओं को संगठित कर रानी झांसी रेजिमेंट की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह केवल एक सैन्य इकाई नहीं थी, बल्कि भारतीय महिलाओं के आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गई। यहीं से उन्हें पूरे देश में "कैप्टन लक्ष्मी" के नाम से पहचान मिली। उन्होंने सैनिकों को प्रशिक्षित किया, उनका नेतृत्व किया और युद्ध क्षेत्र में चिकित्सा सेवाएँ भी प्रदान कीं। उनका विश्वास था कि स्वतंत्रता की लड़ाई में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के समान ही महत्वपूर्ण है।

बर्मा अभियान के दौरान उन्होंने कठिन परिस्थितियों में घायल सैनिकों का उपचार किया। सीमित संसाधनों, भोजन की कमी, बीमारियों और लगातार संघर्ष के बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य से कभी पीछे हटने का विचार नहीं किया। जब युद्ध की दिशा बदल गई और आज़ाद हिंद फ़ौज को पीछे हटना पड़ा, तब भी उन्होंने अपने साथियों का साथ नहीं छोड़ा। अंततः ब्रिटिश सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उनकी राष्ट्रभक्ति और साहस को कैद नहीं किया जा सका।

1946 में रिहाई के बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अधिकारी कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह किया और कानपुर में बस गईं। भारत की स्वतंत्रता के बाद अधिकांश लोग सार्वजनिक जीवन से अलग हो गए, लेकिन लक्ष्मी सहगल ने अपने संघर्ष को नई दिशा दी। उन्होंने गरीबों, मजदूरों, महिलाओं और शरणार्थियों के लिए चिकित्सा सेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके क्लिनिक के दरवाजे हर जरूरतमंद के लिए खुले रहते थे और वे आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना मरीजों का इलाज करती थीं।

भारत विभाजन की त्रासदी ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने विस्थापित परिवारों की सहायता की और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए लगातार काम किया। बाद के वर्षों में भी वे हर मानवीय संकट में सबसे आगे दिखाई दीं। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने शरणार्थियों के लिए चिकित्सा शिविरों में सेवा दी। 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद वे राहत कार्यों में सक्रिय रहीं। उसी वर्ष हुए सिख विरोधी दंगों के दौरान उन्होंने पीड़ित परिवारों की सहायता की और सामाजिक शांति स्थापित करने का प्रयास किया।

राजनीतिक रूप से भी वे सामाजिक न्याय और समानता की प्रबल समर्थक थीं। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़कर महिलाओं, श्रमिकों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए कार्य किया। वे अखिल भारतीय लोकतांत्रिक महिला संघ की संस्थापक सदस्यों में शामिल रहीं और महिला सशक्तिकरण के अनेक अभियानों का नेतृत्व किया। वर्ष 2002 में वे भारत के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार भी बनीं। यद्यपि वे चुनाव नहीं जीत सकीं, लेकिन उनकी उम्मीदवारी ने यह संदेश दिया कि सार्वजनिक जीवन में सेवा, ईमानदारी और वैचारिक प्रतिबद्धता भी सर्वोच्च पद तक पहुँचने का आधार बन सकती है।

उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1998 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए नहीं, बल्कि चिकित्सा, समाज सेवा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके आजीवन समर्पण की भी पहचान था।

कैप्टन लक्ष्मी सहगल का व्यक्तित्व अनेक आयामों से भरा हुआ था। वे एक कुशल चिकित्सक थीं, जिन्होंने जीवन के अंतिम दिनों तक मरीजों का उपचार जारी रखा। वे एक निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने हथियार उठाने से भी परहेज नहीं किया। वे समाज सुधारक थीं, जिन्होंने हर संकट में पीड़ितों के साथ खड़े रहने को अपना धर्म माना। वे महिलाओं की प्रेरणा थीं, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व, साहस और राष्ट्रसेवा किसी एक लिंग तक सीमित नहीं हैं।

19 जुलाई 2012 को उन्हें हृदयाघात हुआ और 23 जुलाई 2012 को कानपुर में उनका निधन हो गया। मृत्यु के बाद भी उन्होंने मानवता की सेवा का संदेश दिया। उनकी इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर चिकित्सा अनुसंधान के लिए मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया गया। यह निर्णय भी उनके जीवन दर्शन का प्रतीक था, जिसमें सेवा का भाव अंतिम क्षण तक बना रहा।

आज कैप्टन लक्ष्मी सहगल केवल इतिहास की एक महान हस्ती नहीं हैं, बल्कि साहस, सेवा, समानता और राष्ट्रभक्ति की जीवंत प्रेरणा हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व सत्ता या पद से नहीं, बल्कि दूसरों के लिए निस्वार्थ समर्पण से जन्म लेता है। भारत की स्वतंत्रता, महिला सशक्तिकरण और मानवीय सेवा के इतिहास में उनका योगदान सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को यह प्रेरणा देती रहेगी कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े शब्दों से नहीं, बल्कि साहस, करुणा और कर्म से होता है।