International Youth Day 2026: युवा शक्ति, इतिहास और नए समाज की कहानी | Special Article By Dr. Katheriya
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International Youth Day Article By Dr. Katheriya
12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है।
2026 की थीम: “Different Contexts, Common Aspirations”।
युवा भागीदारी, विकास और शांति के महत्वपूर्ण साझेदार हैं।
Nagpur / हर वर्ष 12 अगस्त को दुनिया अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाती है। यह केवल युवाओं को शुभकामनाएं देने का दिन नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी की भूमिका, चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार करने का अवसर है, जो वर्तमान समाज को दिशा देने के साथ भविष्य का निर्माण भी कर रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस दिवस का उद्देश्य युवाओं से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने लाना और युवाओं को वैश्विक समाज के सक्रिय साझेदार के रूप में पहचान देना है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की कहानी केवल 12 अगस्त की तारीख से शुरू नहीं होती। इसके पीछे कई दशकों में विकसित हुई वह सोच है, जिसमें दुनिया ने धीरे-धीरे यह स्वीकार किया कि युवा केवल भविष्य की शक्ति नहीं, बल्कि वर्तमान के विकास, शांति और सामाजिक परिवर्तन के भी महत्वपूर्ण भागीदार हैं।
भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस हर वर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस 12 अगस्त को पूरी दुनिया में मनाया जाता है। दोनों दिवसों का उद्देश्य युवाओं की भूमिका, उनकी क्षमता और समाज के निर्माण में उनके योगदान को पहचान देना है, हालांकि इनके ऐतिहासिक संदर्भ अलग हैं। भारत सरकार 1985 से 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाती है और स्वामी विवेकानंद के विचारों को भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत मानती है। उनके विचारों में आत्मविश्वास, चरित्र, साहस, अनुशासन और राष्ट्र-निर्माण की भावना विशेष रूप से दिखाई देती है। इस अर्थ में भारत का राष्ट्रीय युवा दिवस युवा चेतना को राष्ट्रीय संदर्भ देता है, जबकि 12 अगस्त का अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस उसी युवा शक्ति को वैश्विक संदर्भ में देखने का अवसर देता है।
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अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की वैश्विक यात्रा की एक महत्वपूर्ण शुरुआत वर्ष 1965 में दिखाई देती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 2037 के माध्यम से युवाओं के बीच शांति, पारस्परिक सम्मान और विभिन्न देशों के लोगों के बीच समझ की भावना को बढ़ावा देने वाली घोषणा का समर्थन किया। इसके बाद 1965 से 1975 के बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा और आर्थिक एवं सामाजिक परिषद ने युवा नीति के तीन प्रमुख आधारों पर जोर दिया: भागीदारी, विकास और शांति। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें युवाओं को केवल सहायता या संरक्षण पाने वाले समूह के रूप में नहीं, बल्कि विकास और सामाजिक परिवर्तन में योगदान देने वाले नागरिकों के रूप में देखा गया।
युवा नीति की इस वैश्विक सोच को वर्ष 1985 में एक बड़ा पड़ाव मिला। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1979 में 1985 को International Youth Year: Participation, Development, Peace घोषित किया। इसका संदेश स्पष्ट था कि युवाओं का विकास तभी सार्थक है, जब उन्हें समाज और राष्ट्र के विकास तथा शांति की प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर मिले। 1985 में स्वीकार किए गए दिशानिर्देशों में यह भी समझा गया कि दुनिया के सभी युवाओं की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। ग्रामीण और शहरी युवाओं, युवा महिलाओं, दिव्यांग युवाओं तथा अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों में रहने वाले युवाओं की आवश्यकताएं अलग हो सकती हैं। इसलिए युवा विकास की नीतियों में विविधता और समान अवसर दोनों को महत्व देना आवश्यक है।
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसकी अवधारणा स्वयं युवाओं की आवाज से सामने आई। वर्ष 1991 में ऑस्ट्रिया के वियना में संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के World Youth Forum के पहले सत्र में भाग लेने वाले युवाओं ने अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस घोषित करने का सुझाव दिया। इसका उद्देश्य युवाओं से जुड़े संगठनों के साथ मिलकर जागरूकता बढ़ाना तथा युवा कार्यक्रमों के लिए समर्थन और संसाधन जुटाना था। यह घटना बताती है कि अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस केवल ऊपर से बनाई गई व्यवस्था नहीं थी। इसकी जड़ में युवाओं की अपनी भागीदारी और अपनी आवाज को वैश्विक मंच तक पहुंचाने की इच्छा थी।
इसके बाद वर्ष 1998 में पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में World Conference of Ministers Responsible for Youth आयोजित हुआ। सम्मेलन ने 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में घोषित करने की सिफारिश की। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 17 दिसंबर 1999 को प्रस्ताव A/RES/54/120 के माध्यम से इस सिफारिश का समर्थन किया। इसके बाद 12 अगस्त 2000 को पहली बार अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाया गया। इस प्रकार एक लंबे अंतरराष्ट्रीय विमर्श ने ऐसी तारीख को जन्म दिया, जो आज दुनिया भर में युवाओं की आवाज, उनकी उपलब्धियों, समस्याओं और सामाजिक भूमिका पर चर्चा का अवसर बन चुकी है।
इस प्रक्रिया के साथ युवा नीति का दायरा भी बढ़ता गया। World Programme of Action for Youth को युवा विकास के लिए एक महत्वपूर्ण नीति ढांचे के रूप में आगे बढ़ाया गया। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, सामाजिक भागीदारी, शांति, पर्यावरण और सतत विकास जैसे विषय युवा विमर्श के केंद्र में आते गए। वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 12 अगस्त 2010 से शुरू होने वाले वर्ष को International Year of Youth घोषित किया। यह 1985 के पहले International Youth Year की 25वीं वर्षगांठ से भी जुड़ा था। वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2250 ने Youth, Peace and Security के संदर्भ में युवाओं को शांति निर्माण और हिंसा की रोकथाम के महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में पहचान दी।
आज का युवा एक बिल्कुल अलग दुनिया में जी रहा है। इंटरनेट, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टार्टअप, सोशल मीडिया और नई तकनीकों ने सीखने, काम करने और अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने के अवसर बढ़ाए हैं। लेकिन इसी समय युवाओं के सामने बेरोजगारी, कौशल का अंतर, शिक्षा की असमानता, सामाजिक और आर्थिक विषमता, जलवायु परिवर्तन, गलत सूचना और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसी चुनौतियां भी हैं। इसलिए केवल युवा आबादी बड़ी होना पर्याप्त नहीं है। उस आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षित वातावरण और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी का अवसर मिलना भी जरूरी है।
डिजिटल युग ने युवाओं की शक्ति को और बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ी है। आज एक युवा कुछ ही सेकंड में किसी सूचना को हजारों लोगों तक पहुंचा सकता है। इसलिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल तकनीक चलाना नहीं, बल्कि सूचना की सत्यता जांचना, स्रोत को समझना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का जिम्मेदार उपयोग करना और असहमति को नफरत में बदलने से रोकना भी है। सोशल मीडिया पर सक्रिय नागरिकता तभी सार्थक होगी, जब अभिव्यक्ति के साथ विवेक, अधिकारों के साथ जिम्मेदारी और स्वतंत्रता के साथ संवेदनशीलता जुड़ी हो।
भारत के लिए यह प्रश्न विशेष महत्व रखता है। भारत की बड़ी युवा आबादी देश की एक बड़ी ताकत है, लेकिन इस ताकत को वास्तविक विकास में बदलने के लिए शिक्षा और कौशल के बीच बेहतर संबंध, रोजगार के अवसर, युवा महिलाओं की सुरक्षा और भागीदारी तथा सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को दूर करना जरूरी है। शिक्षा व्यवस्था की क्षमता, रोजगार के सीमित अवसर, युवा महिलाओं के सामने आने वाली सामाजिक बाधाएं तथा पोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं आज भी भारतीय युवाओं की क्षमता के रास्ते में महत्वपूर्ण चुनौतियों के रूप में खड़ी हैं। इसलिए युवा दिवस केवल युवाओं की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों पर विचार करने का अवसर भी है, जो युवाओं की क्षमता को सीमित करती हैं।
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि युवाओं की भागीदारी केवल मंच पर भाषण देने या किसी कार्यक्रम में प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें स्थानीय विकास, सामाजिक निर्णय, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और समुदाय की समस्याओं के समाधान में वास्तविक भूमिका मिलनी चाहिए। वर्ष 2025 में स्थानीय स्तर पर Sustainable Development Goals के क्रियान्वयन में युवाओं की भूमिका पर जोर दिया गया था। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैश्विक लक्ष्य तभी प्रभावी होते हैं, जब वे गांव, कस्बे, शहर और स्थानीय समुदायों की वास्तविक जरूरतों से जुड़ें।
अब वर्ष 2026 का अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस इस विमर्श को एक और व्यापक दिशा देता है। संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष की थीम “Different Contexts, Common Aspirations” रखी है, जिसका अर्थ है कि युवाओं की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन सम्मान, अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अच्छा रोजगार, स्वास्थ्य और निर्णय प्रक्रिया में अपनी आवाज जैसी उनकी आकांक्षाएं व्यापक रूप से समान हैं। इस वर्ष की थीम विशेष रूप से अल्पविकसित देशों, स्थलरुद्ध विकासशील देशों और लघु द्वीपीय विकासशील राष्ट्रों के युवाओं पर केंद्रित है, जहां गरीबी, जलवायु परिवर्तन, भौगोलिक दूरी और डिजिटल तकनीक तक सीमित पहुंच जैसी चुनौतियां प्रायः एक साथ सामने आती हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले युवा आर्थिक असुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल समावेशन और सामाजिक असमानता जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इसलिए 2026 का संदेश केवल युवाओं के बीच समानता खोजने का नहीं, बल्कि अलग-अलग परिस्थितियों के बावजूद साझा जिम्मेदारी और वैश्विक सहयोग को मजबूत करने का भी है।
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यहीं से आज के युवा के लिए सबसे बड़ी सीख सामने आती है। सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का नाम नहीं है। एक युवा अच्छी शिक्षा हासिल करे, अच्छा रोजगार पाए, आर्थिक रूप से मजबूत बने और अपने सपने पूरे करे, यह जरूरी है; लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी उतना ही जरूरी है कि उसकी प्रतिभा समाज के लिए कितनी उपयोगी है। तकनीक का ज्ञान यदि गलत सूचना फैलाने में इस्तेमाल हो तो वही प्रतिभा नुकसान पहुंचा सकती है। इसके विपरीत वही तकनीक शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण, स्वास्थ्य या जनजागरूकता के लिए इस्तेमाल की जाए तो वह सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है।
नए समाज का निर्माण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, विद्यालय, विश्वविद्यालय, संस्थाएं और सरकारें अपनी-अपनी भूमिका निभाती हैं, लेकिन समाज की वास्तविक दिशा नागरिकों के विचारों और व्यवहार से बनती है। आज का युवा कल का शिक्षक, पत्रकार, वैज्ञानिक, उद्यमी, डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार, किसान, प्रशासक, सामाजिक कार्यकर्ता या जनप्रतिनिधि हो सकता है। इसलिए आज की युवा पीढ़ी जिस तरह सोचती है, जिस तरह असहमति को संभालती है, जिस तरह सत्य और जिम्मेदारी को महत्व देती है और जिस तरह दूसरों के अधिकारों का सम्मान करती है, वही आने वाले समाज की गुणवत्ता तय करेगी।
नए समाज के निर्माण के लिए युवाओं को कुछ मूल संकल्प अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए: ज्ञान को प्राथमिकता देना, सत्य की जांच करना, कौशल विकसित करना, विविधता को स्वीकार करना, तकनीक का जिम्मेदार उपयोग करना और समाज के प्रति संवेदनशील रहना। लोकतंत्र में विचारों का अलग होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति को दुश्मनी में बदल देना समाज को कमजोर करता है। युवा यदि संवाद, तर्क और सहिष्णुता को अपनाते हैं, स्थानीय समस्याओं के समाधान में भाग लेते हैं और अपने ज्ञान तथा कौशल का उपयोग समाज के हित में करते हैं, तो वे केवल अपने लिए बेहतर भविष्य नहीं बनाते, बल्कि एक अधिक स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति की नींव भी रखते हैं।
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की पूरी ऐतिहासिक यात्रा को देखें तो इसका मूल संदेश लगातार एक ही रहा है: भागीदारी, विकास और शांति। 1965 की वैश्विक सोच से लेकर 1985 के International Youth Year, 1991 में युवाओं की पहल, 1998 की लिस्बन सिफारिश, 1999 के संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव और 2000 में पहले अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस तक की यात्रा इसी विचार को मजबूत करती है कि युवाओं को समाज के किनारे खड़ा करके विकास संभव नहीं है। उन्हें निर्णय प्रक्रिया और परिवर्तन के केंद्र में स्थान देना होगा।
आज 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाते हुए सबसे जरूरी बात यह समझना है कि युवा केवल देश का भविष्य नहीं हैं, वे देश का वर्तमान भी हैं। नया समाज किसी दूसरे व्यक्ति के आने से नहीं बनेगा। वह हमारे विचारों, हमारे निर्णयों, हमारी भाषा, हमारी तकनीक के उपयोग और हमारे दैनिक व्यवहार से बनेगा। यदि युवा ज्ञान को अपनी शक्ति, संवेदनशीलता को अपनी पहचान, सत्य को अपना आधार और सेवा को अपना उद्देश्य बना लें, तो आने वाला समाज केवल आधुनिक नहीं, बल्कि अधिक न्यायपूर्ण, मानवीय, शांतिपूर्ण और जिम्मेदार भी हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की वास्तविक सार्थकता तभी पूरी होगी, जब 12 अगस्त बधाई देने की तारीख से आगे बढ़कर युवाओं के संकल्प और सामाजिक जिम्मेदारी का दिन बने। आज का युवा केवल यह न सोचे कि उसे समाज से क्या मिलना है, बल्कि यह भी सोचे कि वह समाज को क्या दे सकता है। यही सोच व्यक्तिगत सफलता को सामाजिक उपलब्धि में बदल सकती है और यही जिम्मेदारी एक ऐसे नए समाज की नींव रख सकती है, जिसमें विकास के साथ मानवता, तकनीक के साथ विवेक, स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और अवसर के साथ समानता भी मौजूद हो।
संप्रति:
लेखक : डॉ. धरवेश कठेरिया
एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा।
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