विशेष आलेख- विभाजन विभीषिका: विस्थापन के बीच सेवा और राष्ट्रीय दायित्व- डॉ. कठेरिया

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विशेष आलेख- विभाजन विभीषिका: विस्थापन के बीच सेवा और राष्ट्रीय दायित्व- डॉ. कठेरिया
  • 1947 के विभाजन में बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, जिसके बीच संघीय अभिलेख स्वयंसेवकों द्वारा राहत शिविर और मानवीय सहायता गतिविधियों का उल्लेख करते हैं।

  • 1950 के दस्तावेजों में शरणार्थियों के लिए धन, भोजन और वस्त्र जुटाने तथा जरूरतमंद क्षेत्रों में स्वयंसेवक भेजने की अपील दर्ज है।

  • विभाजन की स्मृति आज भी सामाजिक एकता और मानवीय संवेदना से जुड़ी है, जबकि विभिन्न संगठनों की भूमिकाओं की ऐतिहासिक व्याख्या अलग-अलग रही है।

Maharashtra / Nagpur :

विभाजन विभीषिका: विस्थापन के बीच सेवा और राष्ट्रीय दायित्व

डॉ. धरवेश कठेरिया

स्वतंत्रता की वह सुबह, जिसका भारत ने वर्षों के संघर्ष के बाद स्वागत किया, अपने साथ केवल उत्सव और आशा नहीं लाई थी। 15 अगस्त, 1947 के ठीक साथ इतिहास का एक ऐसा अध्याय भी खुला, जिसमें विस्थापन, हिंसा और बिछड़ने की असंख्य कहानियाँ दर्ज हुईं। विभाजन की त्रासदी ने परिवारों को अपनी जड़ों से उखाड़ दिया और लाखों लोगों को अनिश्चित भविष्य की ओर जाने के लिए विवश किया। भारत सरकार ने विभाजन के प्रभाव को लगभग दो करोड़ लोगों के जीवन से जुड़ा बताया है। पंजाब और बंगाल इस त्रासदी के प्रमुख केंद्र बने, जहाँ लाखों परिवारों को अपना घर, आजीविका और पहचान पीछे छोड़कर शरणार्थी बनना पड़ा।

इसी मानवीय संकट के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका सामने आती है। संघ के आधिकारिक 1947 अभिलेख के अनुसार, विभाजन को हिंदू समाज के लिए गहरा आघात मानते हुए संगठन ने विस्थापितों की सहायता के लिए 3,000 राहत शिविर आयोजित किए। इन शिविरों के माध्यम से भोजन, आश्रय और अन्य आवश्यक मानवीय सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।

सेवा को संगठनात्मक रूप 1950 में और अधिक स्पष्टता के साथ मिला। 7 मार्च, 1950 को सरसंघचालक श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) ने पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की सहायता के लिए सार्वजनिक अपील की। उन्होंने कहा:

“उन लाखों सताये हुए और बेघर भाई-बहिनों को प्रेम और आत्मीयता से अपनाना अत्यन्त आवश्यक है।”

श्री गुरुजी, सरसंघचालक, वक्तव्य, 1950

उन्होंने अपने वक्तव्य में डेढ़ करोड़ से अधिक हिन्दुओं के भारत आने की इच्छा का उल्लेख किया। यह संख्या उसी वक्तव्य में दर्ज अनुमान थी। गुरुजी ने समाज से धन, खाद्य सामग्री और वस्त्र जुटाने का आग्रह किया, ताकि पीड़ितों की सहायता केवल सरकारी दायित्व न रहकर पूरे समाज की जिम्मेदारी बने।

इस भावना को औपचारिक रूप 12 मार्च, 1950 को नागपुर में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के प्रस्ताव के माध्यम से मिला:

“पाकिस्तान-स्थित हिन्दु भारतीय राष्ट्रीयता से न तो वंचित हुए हैं और न हो ही सकते हैं।”

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, प्रस्ताव, 1950

प्रस्ताव ने सरकार से सुरक्षा और सहायता के ठोस कदम उठाने का आग्रह किया तथा स्वयंसेवकों को धन जुटाने और आवश्यक स्थानों पर स्वयंसेवक भेजने का निर्देश दिया। इससे स्पष्ट होता है कि संघ के लिए सेवा केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि संकट के समय निभाए जाने वाले संगठित सामाजिक उत्तरदायित्व का हिस्सा थी।

ज़मीनी स्तर पर पंजाब में हिंदू सहायता समिति और पंजाब राहत समिति तथा पूर्वी बंगाल के लिए वास्तुहारा सहायता समिति जैसे संगठित प्रयास सामने आए। राहत शिविरों में भोजन और आश्रय की व्यवस्था के साथ चिकित्सा, बिछड़े परिवारों की खोज और अंतिम संस्कार जैसे कठिन मानवीय कार्यों में भी स्वयंसेवकों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है।

इस सेवा-कार्य की गूँज महात्मा गांधी तक भी पहुँची। संघ के रिकॉर्ड के अनुसार, 14 सितंबर, 1947 को दिल्ली की भंगी कॉलोनी में गांधीजी ने लगभग 500 स्वयंसेवकों को संबोधित किया और उनके अनुशासन तथा जातिगत भेदभाव के अभाव से प्रभावित होने की बात कही। यह प्रसंग उस दौर में स्वयंसेवी संगठनों की सक्रिय सामाजिक उपस्थिति को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

विभाजन के बाद संघ की भूमिका राहत-कार्य तक सीमित नहीं रही। राष्ट्रीय अखंडता का प्रश्न भी उसके सामने था। संघ के अभिलेख के अनुसार, गुरुजी 17 अक्टूबर, 1947 को श्रीनगर गए और महाराजा हरि सिंह से कश्मीर के भारत में विलय का आग्रह किया। हालांकि कश्मीर का भारत में विलय अनेक राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों का परिणाम था, फिर भी यह प्रसंग उस समय संघ की राष्ट्रीय अखंडता संबंधी दृष्टि को सामने रखता है।

विभाजन की व्याख्या को लेकर इतिहासकारों और विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक धाराओं में मतभेद रहे हैं। इसलिए संघ के अभिलेखों को पूरे विभाजन-इतिहास का अंतिम निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा। फिर भी उसकी भूमिका को समझने के लिए उसके प्राथमिक दस्तावेजों का अध्ययन आवश्यक है। भारत सरकार ने 2021 में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ घोषित किया, ताकि विभाजन की पीड़ा को याद किया जा सके और उससे एकता, सामाजिक सद्भाव तथा मानवीय संवेदना का संदेश आने वाली पीढ़ियों तक पहुँच सके।

राष्ट्र केवल सीमाओं और सत्ता-व्यवस्था से नहीं बनता। विभाजन ने असाधारण पीड़ा दी, लेकिन उसी दौर ने यह भी दिखाया कि संकट की घड़ी में संगठित सेवा समाज को संभालने और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को मजबूत करने का आधार बन सकती है। यही विभाजन की विभीषिका से निकला सेवा-संकल्प का सबसे बड़ा सबक है।

संप्रति:

लेखक : डॉ. धरवेश कठेरिया

एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

Email: [email protected]