AI से महंगाई पर क्या होगा असर? ECB के फैबियो पनेटा ने बताया
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AI Economy
AI से होने वाले आर्थिक लाभ का वितरण महंगाई और कुल मांग को प्रभावित कर सकता है।
रोजगार और आय बढ़ने पर AI के शुरुआती दौर में मांग बढ़ सकती है।
ऑटोमेशन हावी होने पर कमजोर खपत से महंगाई घटने का असर जल्दी दिख सकता है।
New Delhi / आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को लेकर दुनियाभर में आर्थिक बदलाव की चर्चा तेज है। ऐसे में केंद्रीय बैंकों के सामने एक नई चुनौती भी उभर रही है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य फैबियो पनेटा ने कहा है कि केंद्रीय बैंकों के लिए यह समझना बेहद जरूरी होगा कि एआई से होने वाले आर्थिक लाभ का फायदा समाज के किन वर्गों को मिल रहा है। उनके मुताबिक, लाभ का वितरण आने वाले समय में कुल मांग और महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पनेटा ने सोमवार को यूक्रेन के नेशनल बैंक की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में एआई के आर्थिक प्रभाव पर अपने विचार रखे। वह इटली के केंद्रीय बैंक के गवर्नर भी हैं। उन्होंने कहा कि एआई आने वाले वर्षों में उत्पादकता और आर्थिक विकास की रफ्तार को बदल सकता है। इसके साथ ही इसका असर रोजगार, वित्तीय बाजारों और भुगतान प्रणालियों पर भी दिखाई देगा।
उन्होंने कहा कि एआई का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि तकनीक से मिलने वाला लाभ किस तरह और कितनी तेजी से लोगों तक पहुंचता है। यदि एआई के कारण नए प्रकार के काम और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं तथा लोगों की भविष्य की आय को लेकर उम्मीद मजबूत होती है, तो उपभोक्ता खर्च बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में एआई से मिलने वाले उत्पादकता लाभ पूरी तरह सामने आने से पहले ही मांग में तेजी आ सकती है।
पनेटा के अनुसार, मांग में यह बढ़ोतरी महंगाई के दबाव को लंबे समय तक बनाए रख सकती है। यानी एआई जहां लंबे समय में उत्पादन क्षमता बढ़ाने और लागत कम करने में मदद कर सकता है, वहीं शुरुआती दौर में आय और मांग बढ़ने से कीमतों पर दबाव भी देखने को मिल सकता है।
इसके उलट यदि एआई का सबसे बड़ा असर स्वचालन यानी ऑटोमेशन के रूप में सामने आता है और बड़ी संख्या में मौजूदा काम मशीनों या तकनीक से होने लगते हैं, तो तस्वीर अलग हो सकती है। ऐसी स्थिति में खपत कमजोर पड़ सकती है। पनेटा ने कहा कि कमजोर उपभोक्ता मांग होने पर एआई के कारण पैदा होने वाले महंगाई घटाने वाले प्रभाव अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई दे सकते हैं।
पनेटा ने केंद्रीय बैंकों की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि किसी भी केंद्रीय बैंक के लिए उसकी विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण संपत्तियों में से एक है। हालांकि, इस विश्वसनीयता को बनाए रखने का तरीका उस समय सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों की प्रकृति पर निर्भर करता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्रीय बैंक एआई से हो रहे बदलावों को नजरअंदाज करके अलग नहीं रह सकते। अर्थव्यवस्था में तकनीकी बदलाव तेजी से हो रहे हैं और इन बदलावों को समझना मौद्रिक नीति बनाने के लिए लगातार जरूरी होता जा रहा है।
एआई का प्रभाव केवल रोजगार और उत्पादन तक सीमित नहीं रहने वाला है। वित्तीय बाजारों में निवेश के तौर-तरीकों से लेकर भुगतान व्यवस्था और कंपनियों की कार्यक्षमता तक इसके असर की संभावना है। ऐसे में केंद्रीय बैंकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तकनीकी प्रगति से पैदा होने वाली अतिरिक्त आय और उत्पादकता का वितरण किस तरह हो रहा है।
पनेटा की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं महंगाई, ब्याज दरों और कमजोर तथा मजबूत मांग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं। एआई इस आर्थिक समीकरण में एक नया कारक बनकर उभर रहा है। इसका अंतिम प्रभाव कितना और किस दिशा में होगा, यह तकनीकी प्रगति के साथ-साथ रोजगार, आय और उपभोक्ता खर्च में होने वाले बदलावों पर भी निर्भर करेगा।
एआई को आर्थिक विकास और उत्पादकता के लिए बड़ा अवसर माना जा रहा है, लेकिन इसका प्रभाव सभी क्षेत्रों पर एक जैसा नहीं होगा। पनेटा के मुताबिक, केंद्रीय बैंकों के लिए यह समझना जरूरी है कि एआई से होने वाले लाभ का वितरण किस तरह हो रहा है, क्योंकि यही भविष्य में मांग, रोजगार और महंगाई की दिशा को प्रभावित कर सकता है।