Abdul Hamid Death Anniversary | परमवीर अब्दुल हमीद की अमर गाथा, 1965 युद्ध में पैटन टैंकों को किया था ध्वस्त
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Param Vir Chakra Abdul Hamid Death Anniversary
अब्दुल हमीद ने 1965 के युद्ध में पैटन टैंकों के खिलाफ अदम्य साहस दिखाया।
असल उत्तर की रणभूमि में वीरता दिखाते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।
उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
10 सितंबर की तारीख भारतीय सैन्य इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। यह वही दिन है जब पंजाब की धरती पर एक साधारण हवलदार ने अपनी एक अदद जीप और एक रिकॉइललेस गन के दम पर दुश्मन के "अजेय" समझे जाने वाले टैंकों के काफिले को खाक में मिला दिया था। नाम था — कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद। आज, उनकी पुण्यतिथि पर, आइए उस योद्धा की कहानी फिर से जीते हैं, जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
प्रारंभिक जीवन: धामूपुर के दर्जी के बेटे का सेना तक सफर
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के एक छोटे से गांव धामूपुर में 1 जुलाई 1933 को मोहम्मद उस्मान और सकीना बेगम के घर एक बालक ने जन्म लिया। परिवार की आर्थिक स्थिति साधारण थी — पिता सिलाई का काम करके घर चलाते थे और चाहते थे कि बेटा भी इसी पेशे को आगे बढ़ाए। लेकिन बचपन से ही इस बालक के भीतर कुछ अलग पलता रहा। गांव की मिट्टी में पला-बढ़ा यह लड़का कुश्ती के दांव-पेंच में माहिर था, तैराकी में उसे कोई मात नहीं दे पाता था, और लाठी चलाने में उसकी फुर्ती देखने लायक होती थी। यही शारीरिक दमखम और निडरता आगे चलकर उसे एक असाधारण सैनिक बनाने वाली थी।
पिता के सपनों से अलग राह चुनते हुए अब्दुल हमीद ने वर्दी पहनने का फैसला किया। दिसंबर 1954 में वे भारतीय सेना की ग्रेनेडियर रेजिमेंट में भर्ती हुए। नसीराबाद के ग्रेनेडियर्स रेजिमेंटल सेंटर में कठोर प्रशिक्षण से गुजरने के बाद उन्हें 1955 में चौथी ग्रेनेडियर्स बटालियन में तैनाती मिली — वही बटालियन जिसके साथ उनका नाम हमेशा के लिए जुड़ जाने वाला था। आगरा से अमृतसर, जम्मू-कश्मीर से दिल्ली और नेफा तक, उन्होंने देश के अलग-अलग मोर्चों पर अपनी सेवाएं दीं। एक साधारण गांव का लड़का अब भारतीय सेना का अनुशासित, कुशल और जुझारू सिपाही बन चुका था।
1962 का युद्ध: संघर्ष की पहली आग में तपा एक योद्धा
भारत-चीन युद्ध के समय अब्दुल हमीद की बटालियन सातवीं इंफैन्ट्री ब्रिगेड का हिस्सा थी, जो नमका-छू के मोर्चे पर पीपल्स लिबरेशन आर्मी के सामने डटी थी। यह वह दौर था जब भारतीय सेना को हिमालय की ऊंचाइयों पर अभावों और प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच लड़ना पड़ा। इस युद्ध ने अब्दुल हमीद को कुछ ऐसा सिखाया जो किसी प्रशिक्षण मैदान में नहीं सिखाया जा सकता — वास्तविक युद्धभूमि का अनुभव, दबाव में संयम रखने की कला, और यह विश्वास कि कर्तव्य की राह में पीछे हटना कोई विकल्प नहीं। यही अनुभव तीन साल बाद खेमकरण के मैदानों में उनके लिए संजीवनी साबित हुआ। इसी दौर में उन्होंने सेवा मेडल और रक्षा मेडल जैसे सम्मान भी अर्जित किए, जो उनकी निष्ठा और कर्तव्यपरायणता के प्रमाण थे।
1965 का युद्ध: जब खेमकरण बन गया अग्निपथ
सितंबर 1965 में पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' के तहत जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर घुसपैठ शुरू की और भारत में अस्थिरता फैलाने की योजना बनाई। जब यह चाल नाकाम हुई, तो पाकिस्तानी सेना ने पंजाब सीमा पर सीधा आक्रमण करने की रणनीति अपनाई। उनके पास एक ऐसा हथियार था जिस पर उन्हें अटूट भरोसा था — अमेरिकी निर्मित पैटन टैंक। उस दौर में इन टैंकों को लगभग अजेय माना जाता था, इतने शक्तिशाली कि इनके सामने पैदल सेना का टिक पाना असंभव समझा जाता था।
तरनतारन जिले के खेमकरण सेक्टर में भारतीय सेना की अग्रिम पंक्ति में चौथी ग्रेनेडियर्स तैनात थी, और उसी में अब्दुल हमीद भी मोर्चे पर डटे थे। भारतीय जवानों के पास न भारी टैंक थे, न आधुनिक हथियार — उनके पास थीं मामूली थ्री-नॉट-थ्री राइफलें, एलएमजी, और सबसे बढ़कर, मातृभूमि की रक्षा के लिए मर-मिटने का जज्बा। अब्दुल हमीद के हिस्से आई एक जीप, जिस पर एक रिकॉइललेस गन लगी थी। दैत्याकार पैटन टैंकों के आगे यह जीप किसी खिलौने से ज्यादा कुछ नहीं लगती थी। पर यही "खिलौना" आने वाले दिनों में इतिहास बदलने वाला था।
असल उत्तर की रणभूमि: आठ से दस सितंबर का जीवंत रण-दृश्य
8 सितंबर 1965 की सुबह पाकिस्तानी सेना ने असल उत्तर गांव की ओर अपने पैटन टैंकों का रेला बढ़ाया। अब्दुल हमीद ने अपनी जीप को गन्ने के खेतों की आड़ में छिपाकर रखा — यह कोई डर से किया गया छिपाव नहीं था, बल्कि एक अनुभवी योद्धा की सधी हुई रणनीति थी। उन्होंने धैर्यपूर्वक टैंकों के रिकॉइललेस गन की सटीक रेंज में आने का इंतजार किया। जैसे ही मौका मिला, उन्होंने एक के बाद एक निशाने साधने शुरू कर दिए। उस दिन उन्होंने अकेले ही चार पैटन टैंकों को धू-धू कर जलता हुआ छोड़ दिया।
खबर मुख्यालय तक पहुंची, साथी सैनिकों का मनोबल आसमान छूने लगा। जिस टैंक बेड़े को अभेद्य समझा जाता था, वह अब एक हवलदार की सटीक निशानेबाजी के आगे बेबस नजर आ रहा था। अगले दिन भी अब्दुल हमीद पीछे नहीं हटे। उनकी गन की गड़गड़ाहट खेमकरण के खेतों में गूंजती रही, और पाकिस्तानी सेना की कतारें तितर-बितर होती चली गईं। इतने टैंक जलकर राख हो गए कि आगे चलकर सैन्य इतिहासकारों ने खेमकरण सेक्टर को व्यंग्य में "पैटन नगर" तक कह डाला — दुश्मन के गर्व का कब्रिस्तान।
अंतिम मोर्चा: शहादत का वह अमर क्षण
10 सितंबर 1965 की सुबह अब्दुल हमीद फिर मोर्चे पर डटे थे। उनकी नजरें एक और पैटन टैंक पर टिकीं, उंगलियां ट्रिगर पर कसी हुईं। उन्होंने निशाना साधा और गन की गूंज के साथ एक और टैंक धराशायी हो गया। दुश्मन के भागते हुए दस्ते का पीछा करते हुए, अपनी जीप में सवार अब्दुल हमीद उस पल भी पीछे मुड़कर नहीं देख रहे थे — उनकी आंखों में बस एक ही लक्ष्य था, दुश्मन को खदेड़ना। तभी एक पाकिस्तानी टैंक ने उनकी जीप पर सीधा निशाना साधा। एक भीषण धमाका हुआ, और उस "गन माउंटेड जीप" पर सवार वीर योद्धा बुरी तरह घायल हो गए।
अपने आखिरी सांस तक अब्दुल हमीद ने उस जज्बे को नहीं छोड़ा, जिसके साथ वे मैदान में उतरे थे। युद्धभूमि की धूल, बारूद की गंध और साथियों की पुकार के बीच, मातृभूमि की रक्षा करते हुए यह वीर सिपाही सदा के लिए अमर हो गया। कहते हैं, शौर्य कभी मरता नहीं — वह बस रूप बदल लेता है, कभी किसी स्मारक में, कभी किसी कहानी में, और कभी किसी नई पीढ़ी की रगों में बहते जज्बे में। अब्दुल हमीद का बलिदान भी ठीक वैसा ही अमर हो गया।
परमवीर चक्र और अमर विरासत
अब्दुल हमीद की असाधारण वीरता और अदम्य साहस को देखते हुए उन्हें पहले महावीर चक्र और फिर मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया — यह सम्मान युद्ध समाप्त होने से भी पहले घोषित कर दिया गया था, जो उनकी वीरता की तात्कालिक गूंज का प्रमाण है। भारतीय डाक विभाग ने वर्ष 2000 में उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया, जिसमें उन्हें अपनी जीप पर सवार, गन थामे दिखाया गया है — मानो समय के किसी एक फ्रेम में उनका साहस सदा के लिए कैद हो गया हो। 1988 में बने दूरदर्शन धारावाहिक "परमवीर चक्र" में दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने उनकी भूमिका निभाकर इस गाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया।
एक साधारण दर्जी के घर जन्मे इस बालक ने साबित कर दिया कि वीरता किसी खास जाति, धर्म या पृष्ठभूमि की मोहताज नहीं होती। यह सिर्फ इस बात पर निर्भर करती है कि किसी के दिल में देश के लिए कितना प्रेम और समर्पण है। अब्दुल हमीद की कहानी आज के युवाओं के लिए एक जीवंत सीख है — कि संसाधनों की कमी कभी इरादों की ऊंचाई को नहीं रोक सकती। एक मामूली जीप और एक गन के सहारे उन्होंने वह कर दिखाया, जो दुनिया की बड़ी-बड़ी सेनाएं भी सोच नहीं पाई थीं।
हर साल 10 सितंबर को जब हम अब्दुल हमीद को याद करते हैं, तो यह सिर्फ एक शहीद को श्रद्धांजलि देना भर नहीं होता। यह उस भावना को फिर से जगाना होता है, जिसने एक साधारण सिपाही को असाधारण योद्धा बना दिया — कर्तव्य, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा। असल उत्तर की धरती आज भी उस वीर की गाथा गुनगुनाती है, और हर भारतीय के मन में उनका नाम गर्व से गूंजता है। परमवीर अब्दुल हमीद अमर रहें।