राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस: रंगनाथन की विरासत, पुस्तकालय और समाज निर्माण की कहानी | Special Article By Dr. Katheriya
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National Librarian Day: Special Article By Dr. Katheriya
डॉ. एस. आर. रंगनाथन की विरासत और पुस्तकालय विज्ञान में योगदान।
पुस्तकालयों की बदलती भूमिका और डिजिटल युग की नई चुनौतियां।
पुस्तक, ज्ञान और युवा शक्ति से समाज निर्माण का संबंध।
Nagpur / किसी समाज की सबसे स्थायी संपत्ति उसकी इमारतें या तकनीक नहीं, बल्कि वह ज्ञान है जिसे वह आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखता है। यही कारण है कि पुस्तकालय को केवल पुस्तकों की अलमारियों वाला स्थान मानना उसके वास्तविक महत्व को छोटा कर देना है। पुस्तकालय किसी समाज की सामूहिक स्मृति, अध्ययन की संस्कृति और बौद्धिक चेतना का केंद्र होता है। यहां बीते समय के विचार वर्तमान पीढ़ी से संवाद करते हैं और वर्तमान का ज्ञान भविष्य के लिए सुरक्षित होता है।
भारत में 12 अगस्त को राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस मनाया जाता है। यह दिवस डॉ. एस. आर. रंगनाथन की स्मृति और भारत में पुस्तकालय विज्ञान के विकास में उनके असाधारण योगदान से जुड़ा है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से जुड़े कार्यक्रम भी 12 अगस्त को डॉ. रंगनाथन की जयंती और National Librarians Day के रूप में आयोजित करते हैं। इसलिए इस दिन का महत्व केवल एक पेशे के सम्मान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक विचार को सामने लाता है कि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह समाज तक पहुंचे।
पुस्तकालय की कहानी आधुनिक भारत से शुरू नहीं होती। मानव सभ्यता के साथ ही ज्ञान को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पैदा हुई। भारत में लंबे समय तक ज्ञान का संरक्षण मौखिक परंपरा, गुरुकुलों, मठों और विद्या-केंद्रों के माध्यम से हुआ। बाद में पांडुलिपियों और ग्रंथों को व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखने की परंपरा विकसित हुई। नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्र इस बात का प्रमाण हैं कि भारत में ज्ञान का संचय और उसका प्रसार बहुत पुरानी बौद्धिक परंपरा का हिस्सा रहा है।
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समय के साथ ज्ञान-संरक्षण के साधन बदलते गए। ताड़पत्र और हस्तलिखित पांडुलिपियों से मुद्रित पुस्तकों तक और मुद्रित पुस्तकों से डिजिटल दस्तावेजों तक की यात्रा ने पुस्तकालय का स्वरूप लगातार बदला। लेकिन उसका मूल उद्देश्य नहीं बदला: ज्ञान को संरक्षित करना, व्यवस्थित करना और उसे पाठक तक पहुंचाना।
आधुनिक भारतीय पुस्तकालय इतिहास में कोलकाता का विशेष स्थान है। वर्तमान National Library, Kolkata की यात्रा 21 मार्च 1836 को स्थापित Calcutta Public Library से शुरू हुई। 1903 में Calcutta Public Library और Imperial Secretariat Library के विलय से Imperial Library बनी। स्वतंत्रता के बाद 1948 में Imperial Library का नाम बदलकर National Library किया गया और 1 फरवरी 1953 को इसे जनता के लिए खोला गया। आज यह भारत में प्रकाशित पुस्तकों, समाचारपत्रों और पत्रिकाओं के स्थायी संरक्षण का प्रमुख राष्ट्रीय केंद्र है।
National Library का महत्व केवल उसके विशाल संग्रह में नहीं है। यह भारत की प्रकाशित बौद्धिक विरासत को सुरक्षित रखने वाली संस्था है। Delivery of Books and Newspapers (Public Libraries) Act, 1954 के अंतर्गत भारत में प्रकाशित सामग्री का संरक्षण इसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है। इस तरह पुस्तकालय इतिहास को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखता है।
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डॉ. एस. आर. रंगनाथन और पुस्तकालय विज्ञान की नई दृष्टि
डॉ. शियाली रामामृत रंगनाथन का जन्म 1892 में तमिलनाडु के शियाली, वर्तमान सर्काझी, में हुआ था। उन्होंने गणित का अध्ययन किया और शिक्षक के रूप में अपना व्यावसायिक जीवन शुरू किया। लेकिन आगे चलकर उनका जीवन पुस्तकालय विज्ञान की दिशा में मुड़ा। 1924 में उन्हें मद्रास विश्वविद्यालय का पुस्तकालयाध्यक्ष नियुक्त किया गया। यही वह मोड़ था जिसने भारत में पुस्तकालय विज्ञान के विकास को नई दिशा दी।
रंगनाथन ने पुस्तकालय को केवल पुस्तकों के संग्रह के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसे पाठक-केंद्रित संस्था के रूप में समझा, जहां पुस्तक का मूल्य उसके उपयोग और पाठक की जरूरत से तय होता है। उन्होंने पुस्तकालय शिक्षा, वर्गीकरण और सूचना संगठन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका Colon Classification system और पुस्तकालय विज्ञान पर उनका लेखन आज भी उनके स्थायी बौद्धिक योगदान के रूप में याद किया जाता है। 1931 में प्रकाशित Five Laws of Library Science ने पुस्तकालय की भूमिका को समझने के लिए एक प्रभावशाली वैचारिक आधार दिया।
रंगनाथन के पांच नियम और उनका आज का अर्थ
1. Books are for use. पुस्तकें उपयोग के लिए हैं।
किताबों का मूल्य उन्हें बंद अलमारियों में सुरक्षित रखने भर में नहीं, बल्कि पाठकों तक पहुंचाने में है। आज यह विचार डिजिटल पुस्तकालयों और खुले शैक्षणिक संसाधनों तक भी लागू होता है।
2. Every reader his or her book. हर पाठक को उसकी पुस्तक मिले।
हर व्यक्ति की उम्र, रुचि, भाषा, शिक्षा और आवश्यकता अलग होती है। इसलिए पुस्तकालय को विविध पाठकों की जरूरत के अनुसार सामग्री उपलब्ध करानी चाहिए।
3. Every book its reader. हर पुस्तक का अपना पाठक है।
किसी पुस्तक की उपयोगिता केवल उसकी लोकप्रियता से तय नहीं होती। किसी विशेष विषय की कम पढ़ी जाने वाली पुस्तक भी किसी विद्यार्थी या शोधकर्ता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है।
4. Save the time of the reader. पाठक का समय बचाइए।
सूचना तक पहुंच सरल और व्यवस्थित होनी चाहिए। आज खोज प्रणाली, डिजिटल कैटलॉग और ऑनलाइन डेटाबेस इस सिद्धांत को नई तकनीकी शक्ति देते हैं।
5. A library is a growing organism. पुस्तकालय एक विकसित होती संस्था है।
नई पुस्तकें, नई भाषाएं, नए विषय, नई तकनीक और नए पाठक पुस्तकालय को लगातार बदलते हैं। इसलिए पुस्तकालय का विकास समय के साथ होना आवश्यक है। यही नियम आज के डिजिटल और हाइब्रिड पुस्तकालयों में विशेष रूप से दिखाई देता है।
पुस्तक से डिजिटल युग तक: बदलता पुस्तकालय और बदलती जरूरतें
21वीं सदी में पुस्तकालय की सीमा उसकी इमारत की दीवारों से आगे बढ़ गई है। National Digital Library of India जैसी पहल ने डिजिटल शैक्षणिक संसाधनों तक पहुंच के नए रास्ते खोले हैं। भारतीय संस्कृति और विरासत से जुड़े डिजिटल संसाधनों के लिए Indian Culture Portal जैसी पहलें भी ज्ञान को अधिक व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचा रही हैं।
लेकिन डिजिटल बदलाव का अर्थ किताब का अंत नहीं है। स्क्रीन सूचना तक तेजी से पहुंचाती है, जबकि अच्छी पुस्तक किसी विषय को गहराई, संदर्भ और निरंतरता के साथ समझने का अवसर देती है। आधुनिक पुस्तकालय की वास्तविक शक्ति इन दोनों को साथ लाने में है। भविष्य का पुस्तकालय संभवतः ऐसा स्थान होगा जहां मुद्रित पुस्तक, ई-बुक, डिजिटल अभिलेख, शोध डेटाबेस और प्रशिक्षित पुस्तकालयाध्यक्ष मिलकर पाठक को ज्ञान की अधिक विश्वसनीय दुनिया उपलब्ध कराएंगे।
आज सूचना की कमी नहीं है, बल्कि विश्वसनीय सूचना की पहचान बड़ी चुनौती है। इंटरनेट पर कुछ सेकंड में हजारों परिणाम मिल जाते हैं, लेकिन हर परिणाम ज्ञान नहीं होता। पुस्तकालय पाठक को केवल सामग्री उपलब्ध कराने के बजाय सूचना खोजने, स्रोतों को समझने और सामग्री की विश्वसनीयता परखने की संस्कृति विकसित करने में मदद कर सकता है।
विद्यार्थी के लिए पुस्तकालय पाठ्यक्रम से आगे सीखने का अवसर है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए यह अध्ययन का शांत वातावरण है। शोधकर्ताओं के लिए यह संदर्भ सामग्री और अभिलेखों तक पहुंच का माध्यम है। बच्चों के लिए यह पढ़ने की आदत विकसित करने का स्थान है। और उन लोगों के लिए, जिनके पास घर पर पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, सार्वजनिक पुस्तकालय शिक्षा और ज्ञान तक अधिक समान पहुंच का साधन बन सकता है।
युवा, पुस्तक और नए समाज का निर्माण
आज की युवा पीढ़ी के पास शायद पिछली किसी भी पीढ़ी की तुलना में अधिक जानकारी उपलब्ध है। लेकिन अधिक जानकारी का अर्थ हमेशा अधिक ज्ञान नहीं होता। असली चुनौती है, जानकारी को समझना, उसकी जांच करना और उससे सही निष्कर्ष निकालना।
एक अच्छी पुस्तक युवा को धैर्य से पढ़ना, तर्क के साथ सोचना और किसी विचार को उसके संदर्भ में समझना सिखाती है। साहित्य संवेदना पैदा करता है, इतिहास वर्तमान को समझने की दृष्टि देता है, विज्ञान जिज्ञासा और प्रमाण की आदत विकसित करता है, जीवनी संघर्ष से प्रेरणा देती है और दर्शन प्रश्न पूछने का साहस देता है। यही कारण है कि पुस्तक पढ़ना केवल परीक्षा की तैयारी नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया है।
युवा को यह भी सीखना होगा कि इंटरनेट पर लोकप्रिय होना किसी विचार के सही होने का प्रमाण नहीं है। पढ़ना उसे त्वरित प्रतिक्रिया से आगे जाकर विचार करने की क्षमता देता है। पुस्तकालय उसे अलग-अलग दृष्टिकोणों से परिचित कराता है। दोनों मिलकर एक अधिक विवेकशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार कर सकते हैं।
समाज में स्थायी परिवर्तन केवल नीतियों और कानूनों से नहीं आता। वह लोगों की सोच, संवेदना और निर्णय लेने की क्षमता में परिवर्तन से आता है। पुस्तक इस परिवर्तन की सबसे शांतिपूर्ण शक्तियों में से एक है। एक किताब किसी व्यक्ति को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक कर सकती है, दूसरी उसके कर्तव्यों का बोध करा सकती है। कोई पुस्तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर सकती है, तो कोई इतिहास की गलतियों से सीखने की प्रेरणा दे सकती है।
जब एक युवा पढ़ता है और फिर अपने ज्ञान को परिवार, कार्यस्थल, समुदाय और समाज की समस्याओं को समझने में लगाता है, तब पुस्तक का प्रभाव व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। ज्ञान संवाद पैदा करता है, संवाद विचार पैदा करता है और विचार सामाजिक परिवर्तन की दिशा तय कर सकते हैं। इस अर्थ में पुस्तकालय केवल ज्ञान के भंडार नहीं, बल्कि नागरिक चेतना के निर्माण की संस्थाएं हैं।
रंगनाथन की विरासत का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने पुस्तकालय को जीवंत और पाठक-केंद्रित संस्था के रूप में देखा। उनके पांच नियम आज भी डिजिटल युग में प्रासंगिक लगते हैं, क्योंकि तकनीक बदलने के बावजूद पाठक की मूल जरूरत वही है: विश्वसनीय ज्ञान तक आसान पहुंच। भारत में पुस्तकालयों के आधुनिकीकरण और डिजिटलीकरण की दिशा में लगातार प्रयास हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पुस्तकालय का भविष्य अतीत की अलमारियों में बंद नहीं है। उसका भविष्य मुद्रित पुस्तकों, डिजिटल तकनीक, स्थानीय भाषाओं, शोध, शिक्षा और नई पीढ़ी की जरूरतों के बीच बनेगा।
राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस केवल पुस्तकालयाध्यक्षों के सम्मान का अवसर नहीं है। यह उस विचार को याद करने का दिन है कि ज्ञान को सुरक्षित रखना और उसे समाज तक पहुंचाना किसी भी सभ्य समाज की मूल जिम्मेदारियों में से एक है। डॉ. एस. आर. रंगनाथन की विरासत हमें बताती है कि पुस्तकालय तभी जीवंत है जब वह पाठक के काम आए और समय के साथ विकसित होता रहे।
आज की युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि सही ज्ञान की पहचान और उसका सार्थक उपयोग है। इसलिए किताब को केवल परीक्षा की सामग्री समझना पर्याप्त नहीं है। उसे विचार का साथी, प्रश्नों का मार्गदर्शक और व्यक्तित्व निर्माण का साधन बनाना होगा।
यदि एक युवा नियमित रूप से पढ़ता है, अलग-अलग विचारों को समझता है, तथ्य और भ्रम में अंतर करना सीखता है और अपने ज्ञान का उपयोग समाज की समस्याओं के समाधान में करता है, तो पुस्तक की शक्ति व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर सामाजिक परिवर्तन में बदल सकती है। एक पुस्तक किसी व्यक्ति की सोच बदल सकती है, बदली हुई सोच परिवार को प्रभावित कर सकती है और जागरूक परिवार समाज को। यही पुस्तकालय की वास्तविक शक्ति है और यही राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस का सबसे बड़ा संदेश है।
संप्रति:
लेखक : डॉ. धरवेश कठेरिया
एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा।
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