अंडमान-निकोबार की जैव विविधता भारत की सुरक्षा व अर्थव्यवस्था की कुंजी: डॉ. जितेंद्र सिंह
ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |
Andaman-Nicobar-Biodiversity-Jitendra-Singh-ZSI
अंडमान-निकोबार की जैव विविधता पर्यावरणीय सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन और समुद्री अर्थव्यवस्था के लिए भारत की रणनीतिक शक्ति है।
नई प्रजातियों की खोज और प्रवाल भित्ति अनुसंधान से भारत वैश्विक जैव विविधता संरक्षण में अग्रणी बन रहा है।
Delhi/ डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की जैव विविधता केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी भारत की बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि यहां का अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तन से निपटने, समुद्री संसाधनों के संरक्षण और सतत आजीविका के नए अवसर पैदा करने में सहायक है।
जेडएसआई के क्षेत्रीय केंद्र में वैज्ञानिकों और अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि संरक्षण को आधुनिक विज्ञान, सटीक डेटा और सामुदायिक भागीदारी के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जेडएसआई जैसे संस्थान नीति निर्माण के लिए प्रामाणिक वैज्ञानिक आंकड़े उपलब्ध कराते हैं, जो जैव विविधता संरक्षण और महासागर आधारित आर्थिक विकास का मार्गदर्शन करते हैं।
इस अवसर पर केंद्र के प्रभारी अधिकारी डॉ. सी. शिवपेरुमन ने मंत्री को केंद्र की गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह केंद्र वर्गीकरण, आणविक प्रणाली विज्ञान, डीएनए बारकोडिंग, जैव विविधता आकलन और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।
1977 में स्थापित जेडएसआई अंडमान-निकोबार क्षेत्रीय केंद्र ने लगभग पांच दशकों में 90 से अधिक अनुसंधान कार्यक्रम पूरे किए हैं। इसके वैज्ञानिकों ने 85 पुस्तकें और 850 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए हैं, जो भारत के जैव विविधता ज्ञान को वैश्विक मंच पर स्थापित करते हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने जेडएसआई संग्रहालय का भी दौरा किया, जहां 22 जीव-जंतु समूहों के लगभग 3,500 नमूने संरक्षित हैं। यह संग्रहालय हर वर्ष 75,000 से एक लाख तक छात्रों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है और जन-जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।
मंत्री को बताया गया कि वैज्ञानिकों ने विज्ञान के लिए 20 से अधिक नई प्रजातियों की पहचान की है, जिनमें नारकोंडम ट्री श्रू भी शामिल है। इसके अलावा, करीब 900 नए जीव-जंतुओं के रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं, जो इस क्षेत्र के वैश्विक जैव विविधता महत्व को रेखांकित करते हैं।
डॉ. सिंह ने पोर्ट ब्लेयर स्थित जेडएसआई की भूमिका को भी सराहा, जो भारत के पहले राष्ट्रीय प्रवाल भित्ति अनुसंधान संस्थान का नोडल केंद्र है। उन्होंने कहा कि ऐसे संस्थान नाजुक समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा और साक्ष्य-आधारित समुद्री शासन के लिए अनिवार्य हैं।
अपने दौरे को “ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद” बताते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने वैज्ञानिकों से अनुसंधान, नीति और जन-जागरूकता के बीच और अधिक समन्वय का आह्वान किया।