ईरान संघर्ष का असर: तेल महंगा, रुपया कमजोर, भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव
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Iran-Israel Conflict Impact India
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ा.
रुपये में गिरावट और महंगाई का खतरा बढ़ा.
एलपीजी महंगा, शेयर बाजार और रेमिटेंस पर असर.
New Delhi / 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले ने पश्चिम एशिया में एक बड़े संघर्ष की शुरुआत कर दी, जिसका असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है—और भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत इस युद्ध का हिस्सा नहीं है, लेकिन इसके आर्थिक झटके उसे सीधे झेलने पड़ रहे हैं।
सबसे बड़ा असर ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से कच्चे तेल की सप्लाई बाधित हुई और कीमतें अचानक 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। हालांकि बाद में यह कुछ गिरकर 103 डॉलर के आसपास आई, लेकिन यह स्तर भी भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए भारी है। भारत अपने तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से उसका आयात बिल 14-16 अरब डॉलर तक बढ़ जाता है।
इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर दिखने लगा है। सरकार ने 7 मार्च को घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी की, जो इस बात का संकेत है कि वैश्विक संकट का बोझ अब धीरे-धीरे उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और इसकी 90 फीसदी आपूर्ति उसी होर्मुज मार्ग से आती है, जो फिलहाल प्रभावित है।
तेल की बढ़ती कीमतें सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहतीं। इससे परिवहन महंगा होता है, और फिर खाद्य पदार्थों, दवाइयों, सीमेंट और रोजमर्रा की चीजों के दाम भी बढ़ने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल में हर 10 डॉलर की वृद्धि से थोक महंगाई (WPI) और खुदरा महंगाई (CPI) दोनों पर दबाव बढ़ता है। जनवरी 2026 में जहां महंगाई दर 2.75% थी, अब वह फिर से बढ़ने के खतरे में है।
मुद्रा बाजार भी इस दबाव से अछूता नहीं रहा। तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपया कमजोर होता है। हाल ही में रुपया गिरकर 93.32 प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। भारतीय रिजर्व बैंक ने स्थिति संभालने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार से हस्तक्षेप किया है, लेकिन यह भी एक सीमित उपाय है।
शेयर बाजार में भी इसका असर साफ दिखा। विदेशी निवेशकों ने मार्च के शुरुआती दिनों में 45 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की निकासी की, जिससे बाजार में गिरावट आई और निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ।
इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम कर रहे करीब 91 लाख भारतीयों से आने वाली रेमिटेंस भी खतरे में पड़ सकती है। अगर वहां की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, तो भारत में आने वाला डॉलर घटेगा, जिसका असर खासकर ग्रामीण और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ेगा।
कुल मिलाकर, यह संकट सिर्फ एक युद्ध का परिणाम नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा निर्भरता और वैश्विक आर्थिक जुड़ाव की कमजोरियों को उजागर करता है। भारत आज 1991 की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है, लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही जटिल हैं। अब असली सवाल यह है कि क्या भारत इन संकेतों से सीख लेकर समय रहते रणनीति बदलेगा, या फिर अगले बड़े आर्थिक झटके का इंतजार करेगा।