राजनाथ सिंह ने ‘विमर्श 2026’ में रक्षा उद्योग के लिए शुरू कीं नई पहलें
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DRDO Industry Collaboration
राजनाथ सिंह ने ‘विमर्श 2026’ में रक्षा उद्योग के लिए नई नीतिगत पहलें शुरू कीं।
13 विनिर्माण भागीदारों को नौ तकनीकी हस्तांतरण समझौते सौंपे गए।
एमएसएमई, डीप-टेक स्टार्ट-अप, ड्रोन और एआई तकनीक को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।
New Delhi / रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित डीआरडीओ-उद्योग सहयोग बैठक ‘विमर्श 2026’ के दौरान रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कई महत्वपूर्ण नीतिगत पहलों की शुरुआत की। इन पहलों का उद्देश्य रक्षा अनुसंधान, तकनीकी विकास, विनिर्माण और निजी क्षेत्र की भागीदारी को मजबूत करना है। कार्यक्रम में विशेष रूप से एमएसएमई, डीप-टेक स्टार्ट-अप और रक्षा उद्योगों के लिए तकनीकी तथा शुरुआती वित्तीय बाधाओं को कम करने पर जोर दिया गया।
नई पहल के तहत एमएसएमई और डीप-टेक स्टार्ट-अप को प्रत्यक्ष वित्त पोषण, इंक्यूबेशन सहायता तथा डीआरडीओ की परीक्षण सुविधाओं तक समर्पित पहुंच उपलब्ध कराने का व्यापक ढांचा तैयार किया गया है। इससे छोटे उद्योगों और नवोन्मेषी कंपनियों को रक्षा तकनीकों के विकास, परीक्षण और उत्पादन में आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।
इसके साथ ही सॉफ्टवेयर आधारित रक्षा क्षमताओं और पुराने प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए एक मानकीकृत तथा सुरक्षित ढांचा भी शुरू किया गया। इसके माध्यम से डीआरडीओ द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड को लाइसेंसधारी उद्योगों के साथ साझा किया जा सकेगा। इस कदम से रक्षा प्रणालियों के सॉफ्टवेयर विकास, उन्नयन और रखरखाव में तेजी आने की उम्मीद है।
13 विनिर्माण भागीदारों को नौ तकनीकी हस्तांतरण समझौते
कार्यक्रम के दौरान रक्षा मंत्री की उपस्थिति में 13 विनिर्माण भागीदारों को नौ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण लाइसेंसिंग समझौते यानी एलएटीओटीएस सौंपे गए। इन समझौतों का उद्देश्य अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के वाणिज्यिक उत्पादन को सक्षम बनाना और स्वदेशी तकनीकों को उद्योग तक पहुंचाना है।
इसके अलावा उद्योग की पहुंच बढ़ाने और जमीनी स्तर पर भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स यानी एसआईडीएम और लघु उद्योग भारती यानी एलयूबी के साथ रणनीतिक समझौता ज्ञापनों का आदान-प्रदान किया गया।
डीआरडीओ ने घरेलू रक्षा उद्यमों की विनिर्माण क्षमता और परिपक्वता का आकलन करने के लिए भारतीय गुणवत्ता परिषद के साथ सिस्टम फॉर एडवांस मैन्युफैक्चरिंग असेसमेंट एंड रेटिंग यानी समर 2.0 के संबंध में एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए।
रक्षा विनिर्माण में वैश्विक केंद्र बनने का लक्ष्य
अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने कहा कि डीआरडीओ और उद्योग के बीच सहयोग केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह सहयोग अनुसंधान, डिजाइन, परीक्षण, प्रमाणन और विनिर्माण सहित पूरी मूल्य श्रृंखला में विस्तार पाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में वैश्विक केंद्र बनाने के लिए सरकारी संस्थानों, उद्योग, स्टार्ट-अप और युवाओं की क्षमताओं को एक साथ लाना जरूरी है।
रक्षा मंत्री ने विकसित भारत के लक्ष्य को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत को वर्ष 2047 तक महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता हासिल करनी होगी। इसके साथ ही स्वदेशी सामग्री का उपयोग बढ़ाने, रक्षा निर्यात में कई गुना वृद्धि करने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की मजबूत भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
उन्होंने रक्षा क्षेत्र में किए गए सुधारों का उल्लेख करते हुए सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों, मेक इन इंडिया, आईडीईएक्स, एडीआईटीआई और रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 प्रतिशत निजी क्षेत्र के लिए निर्धारित किए जाने जैसी पहलों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी विकास कोष के माध्यम से स्टार्ट-अप को अनुदान दिया जा रहा है और कई तकनीकें उत्पादन के चरण तक पहुंच चुकी हैं।
एमएसएमई और स्टार्ट-अप की भूमिका अहम
राजनाथ सिंह ने एमएसएमई और स्टार्ट-अप को भारत में रक्षा नवाचार के नए ध्वजवाहक बताया। उन्होंने कहा कि ये संस्थान अत्याधुनिक तकनीकों के साथ-साथ प्रमुख रक्षा प्रणालियों के घटकों और उप-प्रणालियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
उन्होंने ड्रोन तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में एमएसएमई तथा स्टार्ट-अप की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। रक्षा मंत्री ने कहा कि एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ होने के साथ-साथ रक्षा इकोसिस्टम की महत्वपूर्ण ताकत भी हैं। उन्हें बड़ी कंपनियों के साथ साझेदारी बढ़ाते हुए गुणवत्ता, नवाचार, समयबद्ध आपूर्ति और वैश्विक मानकों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
तकनीकी हस्तांतरण और रक्षा इकोसिस्टम को बढ़ावा
रक्षा सचिव और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव तथा डीआरडीओ अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने कहा कि ‘विमर्श 2026’ का उद्देश्य राष्ट्रीय रक्षा तत्परता को अत्याधुनिक वाणिज्यिक नवाचार से जोड़ना है। उन्होंने बताया कि निजी क्षेत्र की क्षमताओं को रक्षा इकोसिस्टम के केंद्र में व्यवस्थित रूप से शामिल किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि अब तक 1,100 से अधिक उद्योगों को 2,300 से ज्यादा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण सौंपे जा चुके हैं। इसके अलावा डीआरडीओ द्वारा विकसित लगभग 50 मिसाइलों से संबंधित तकनीकों को उद्योगों के लिए उपलब्ध कराया गया है।
कार्यक्रम में ‘डिफेंस सिस्टम्स फॉर रेजिलिएंट भारत - एडवांसिंग आत्मनिर्भरता इन डिफेंस’ नामक पुस्तक का विमोचन भी किया गया। साथ ही डीआरडीओ में मानव संसाधन आउटसोर्सिंग सेवा अनुबंधों से संबंधित दिशानिर्देश जारी किए गए।
तकनीकी सत्रों में वैमानिकी प्रणालियों, मिसाइलों, आयुध, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और नौसेना प्रणालियों से जुड़े तकनीकी रोडमैप पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में 250 से अधिक रक्षा उद्योग प्रतिनिधियों, उद्योग चैंबर, वरिष्ठ अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने भाग लिया। ‘विमर्श 2026’ ने रक्षा अनुसंधान, निजी उद्योग और डीप-टेक स्टार्ट-अप के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए एक संरचित और प्रभावी मंच प्रदान किया।