राजगढ़ वटवृक्ष विवाद: आयु निर्धारण पर वैज्ञानिक बहस, परिधि बनाम रेडियो कार्बन डेटिंग पर सवाल
ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |
Rajasgarh Banyan Tree
राजगढ़ वटवृक्ष की आयु पर वैज्ञानिक विवाद.
परिधि बनाम रेडियो कार्बन डेटिंग की बहस.
स्थानीय लोग 300 साल पुराना मानते हैं.
Rajgarh / धार जिले की सरदारपुर तहसील का राजगढ़ इन दिनों आस्था और विज्ञान के अनूठे संगम को लेकर चर्चा में है। यहाँ स्थित अति प्राचीन श्री शनि-शीतला मंदिर और परिसर में सीना तानकर खड़ा विशाल वटवृक्ष न केवल लोगों की श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि अब प्रदेश के पर्यावरण संरक्षण की एक नई बहस का आधार भी बन गया है। इस वृक्ष के संरक्षण और आयु निर्धारण को लेकर वन विभाग द्वारा अपनाए गए 'गणितीय फॉर्मूले' और स्थानीय दावों के बीच का विरोधाभास अब प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।
आस्था का इतिहास और विभाग का 'अधूरा' गणित
मामले की शुरुआत तब हुई जब सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय भंडारी ने इस वटवृक्ष की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करने और इसे 'संरक्षित विरासत' घोषित कराने के उद्देश्य से पत्राचार किया। राज्य जैव विविधता बोर्ड और वन अनुसंधान संस्थान, जबलपुर के मार्गदर्शन में जब वन विभाग की टीम ने निरीक्षण किया, तो वटवृक्ष की परिधि 5.2 मीटर मापी गई। इस आधार पर विभाग ने वृक्ष की आयु मात्र 137 वर्ष घोषित कर दी। यह रिपोर्ट आते ही राजगढ़ में आश्चर्य की लहर दौड़ गई, क्योंकि जिस मंदिर की नींव राजा-महाराजाओं के काल में रखी गई थी, वह वटवृक्ष उससे भी प्राचीन माना जाता है।
अक्षय भंडारी का तर्क: 'फॉर्मूला नहीं,वैज्ञानिक प्रमाण चाहिए'
युवा सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय भंडारी ने इस गणना को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक त्रुटिपूर्ण 'फॉर्मूला' बताया है। उनका स्पष्ट कहना है कि 300 वर्षों से अधिक का इतिहास संजोने वाले इस वटवृक्ष को महज 137 साल का आंकना, वैज्ञानिक आधार का मजाक उड़ाने जैसा है। भंडारी ने कहा, "वन विभाग ने आदेश का पालन तो किया, लेकिन जिस 'माप पद्धति' (परिधि) का उपयोग किया गया, वह प्राचीन वृक्षों की आयु जानने के लिए कतई पर्याप्त नहीं है। हम किसी विभाग या अनुसंधान के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि यह मांग कर रहे हैं कि वृक्षों की वास्तविक आयु जानने के लिए 'रेडियो कार्बन डेटिंग' जैसी आधुनिक और सटीक वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग किया जाए।"
चार पीढ़ियों की साधना और संरक्षण की नई उम्मीद
इस वटवृक्ष की प्राचीनता का एक जीवंत प्रमाण जोशी परिवार की चार पीढ़ियों का अटूट समर्पण है। मंदिर के वर्तमान पुजारी श्रवण जोशी बताते हैं कि लगभग 250 वर्षों से अधिक समय से उनका परिवार इस स्थान की सेवा में समर्पित है। उनके परदादाओं के समय से शुरू हुई यह परंपरा आज भी पूरी निष्ठा से जारी है। स्व. नारायण जी जोशी ने दशकों तक इस वटवृक्ष को सहेजा और अब चौथी पीढ़ी के रूप में श्रवण जोशी इसे अपनी विरासत के रूप में देख रहे हैं।
प्रदेश के लिए 'रोल मॉडल' बनेगा राजगढ़ का प्रयास
अक्षय भंडारी ने अब इस विषय को राज्य स्तरीय नीति बनाने की दिशा में मोड़ दिया है। उन्होंने मांग की है कि मध्य प्रदेश सरकार 100 वर्ष से अधिक पुराने पीपल, बरगद और नीम जैसे वृक्षों को 'ऐतिहासिक विरासत' घोषित करे और उनके संरक्षण हेतु एक ठोस नीति लागू करे। राजगढ़ के इस प्रयास ने यह सिद्ध कर दिया है कि स्थानीय जागरूकता ही प्रदेश की अमूल्य धरोहरों को सहेजने की पहली सीढ़ी है। यदि सरकार इस दिशा में सकारात्मक पहल करती है, तो राजगढ़ का यह ऐतिहासिक वटवृक्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण संरक्षण का एक गौरवशाली प्रतीक बनेगा।