भारत के 20 सबसे पुराने सिक्के: मौर्य काल से भारतीय गणराज्य तक का ऐतिहासिक सफर
ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |
Indian Coins History
मौर्य, गुप्त, कुषाण और चोल काल के ऐतिहासिक सिक्के.
दिल्ली सल्तनत, मुगल और मराठा काल की मुद्रा परंपरा.
ब्रिटिश भारत से भारतीय गणराज्य तक सिक्कों का विकास.
Nagpur / भारत का इतिहास केवल ग्रंथों और शिलालेखों में ही नहीं, बल्कि उसके सिक्कों में भी जीवित है। हर सिक्का अपने समय की राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म और कला की कहानी कहता है। भारत में हजारों वर्षों से सिक्का प्रचलन में रहा है और अलग-अलग राजवंशों ने अपने शासन की पहचान इन्हीं धातु के टुकड़ों पर अंकित की। आइए भारत के 20 सबसे पुराने और ऐतिहासिक सिक्कों की यात्रा को सरल और मानवीय दृष्टि से समझते हैं।
सबसे पहले मौर्य कालीन पंचमार्क सिक्के आते हैं, जो चांदी से बने होते थे। ये भारत के सबसे प्राचीन सिक्कों में गिने जाते हैं। इन पर अलग-अलग प्रतीक ठप्पे के रूप में अंकित होते थे, जो मौर्य प्रशासन की सख्त व्यवस्था को दर्शाते हैं। इसी काल में सम्राट अशोक के चांदी के सिक्के भी प्रचलन में आए, जिनसे उनके विशाल साम्राज्य और सुव्यवस्थित शासन का संकेत मिलता है।
इसके बाद कुषाण काल में स्वर्ण दीनार का प्रचलन हुआ। कुषाण स्वर्ण दीनार सोने से बने होते थे और व्यापार तथा समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गुप्त काल के स्वर्ण दीनार सामने आते हैं, जिन्हें भारतीय मुद्रा इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है। इन सिक्कों पर राजाओं की मूर्तियां, देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत लेख अंकित होते थे।
दक्षिण भारत में सातवाहन वंश के चांदी के सिक्के और आगे चलकर चोल राजवंश के स्वर्ण सिक्के प्रचलन में आए। चोल सिक्कों पर बने प्रतीक समुद्री व्यापार और दक्षिण भारतीय शक्ति का संकेत देते हैं। इसी तरह विजयनगर साम्राज्य का पगोडा सिक्का सोने का बना होता था, जो उस दौर की आर्थिक मजबूती को दर्शाता है।
मध्यकाल में दिल्ली सल्तनत ने मुद्रा व्यवस्था को नई दिशा दी। दिल्ली सल्तनत का टंका (चांदी) और दीनार (सोना) उस समय की मजबूत अर्थव्यवस्था और केंद्रीकृत शासन का प्रमाण हैं। इसके बाद मुगल काल आया, जिसमें सिक्कों की कला अपने चरम पर पहुंची। अकबर का स्वर्ण मोहर और शाहजहाँ का चांदी का रुपया आज भी संग्रहकर्ताओं के लिए अनमोल धरोहर हैं।
मराठा साम्राज्य ने भी सोने के सिक्कों के जरिए अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। फिर आया औपनिवेशिक दौर, जहां ईस्ट इंडिया कंपनी के चांदी के सिक्के और आगे चलकर ब्रिटिश भारत के सिक्के चलन में आए। विक्टोरिया का स्वर्ण मोहर और जॉर्ज पंचम का चांदी का रुपया ब्रिटिश सत्ता का प्रतीक बने।
रियासतों के दौर में हैदराबाद (तांबा), बड़ौदा (चांदी) और त्रावणकोर (सोना) जैसी रियासतों ने अपने सिक्के जारी किए। आज़ादी के बाद भारतीय गणराज्य का 1 पैसा (तांबा) और 1 रुपया (निकल) आधुनिक भारत की पहचान बने।
इन सिक्कों को देखकर समझ आता है कि भारत का इतिहास केवल राजाओं की कहानियों तक सीमित नहीं, बल्कि हर सिक्का अपने समय की धड़कन को आज तक संजोए हुए है।