तेज़ रफ्तार और एकाकी होती शहरी ज़िंदगी के बीच भगोरिया हमें ठहरकर सोचने का अवसर देता है कि असली उत्सव क्या होता है। शायद वही, जहाँ कोई अकेला न हो, जहाँ खुशियाँ साझा की जाएँ और जहाँ जीवन को बिना बनावट के जिया जाए। इसी भावना को शहर तक पहुँचाने के उद्देश्य से इंदौर में पहली बार ‘जात्रा-2026’ का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन केवल संस्कृति को प्रदर्शित करने का मंच नहीं, बल्कि उसे समझने और आत्मसात करने का अवसर है।
जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के तत्वावधान में 20 से 22 फरवरी, 2026 तक गांधी हॉल परिसर में होने वाला यह तीन दिवसीय महोत्सव, आदिवासी समाज की आत्मा को शहर के बीचों-बीच ले आएगा। समिति के अध्यक्ष देवकीनंदन तिवारी और कोषाध्यक्ष श्री गिरीश चव्हाण के अनुसार, ‘जात्रा-2026’ का उद्देश्य भगोरिया की उस जीवंत भावना को शहरवासियों तक पहुँचाना है, जिसमें प्रेम, भरोसा और सहभागिता सबसे महत्वपूर्ण हैं। इस आयोजन में प्रवेश निःशुल्क रहेगा, ताकि हर वर्ग के लोग इसमें भाग ले सकें।
महोत्सव में 100 से अधिक स्टॉल लगाए जाएंगे, जहाँ आदिवासी समाज के पारंपरिक व्यंजन, हस्तशिल्प, साहित्य और परिधान उपलब्ध होंगे। भगोरिया पर आधारित फोटो प्रदर्शनी इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण होगी, जो पर्व की असली झलक शहर तक पहुँचाएगी। ट्राइबल फाउंडेशन द्वारा ‘पिथोरा’ आर्ट गैलरी भी प्रदर्शित की जाएगी, जो आदिवासी जीवन और परंपराओं की रंगीन तस्वीर पेश करेगी। 21 फरवरी को ‘अमू काका बाबा न पोरिया’ फेम गायक आनंदीलाल भावेल अपनी टीम के साथ लाइव प्रस्तुति देंगे, जो उत्सव में चार चाँद लगाएगी।
भगोरिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कोई दर्शक नहीं होता, हर कोई सहभागी होता है। यह वह पर्व है जहाँ रिश्ते डर या दबाव से नहीं, बल्कि सहमति और सम्मान से बनते हैं। लोकमान्यता के अनुसार, भगोरिया हाट में युवक-युवती एक-दूसरे को गुलाल लगाकर अपने प्रेम को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हैं और समाज की सहमति से नया जीवन शुरू करते हैं। न कोई दिखावा, न कोई जटिल रस्म—बस सहजता और विश्वास।
भगोरिया आदिवासी समाज की सामाजिक आज़ादी का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता से बहुत पहले आदिवासी समाज ने रिश्तों और स्वतंत्रता की अपनी परिभाषा गढ़ ली थी। ‘जात्रा-2026’ इसी संवाद को आगे बढ़ाने का माध्यम है—प्रकृति से संवाद, समाज से संवाद और खुद से संवाद।
जब शहर का दर्शक इस उत्सव को देखेगा, समझेगा और महसूस करेगा, तो शायद उसे अपनी जड़ों की आहट भी सुनाई देगी। तीन दिनों का यह आयोजन न केवल एक सांस्कृतिक महोत्सव होगा, बल्कि यह याद दिलाएगा कि भारत की असली पहचान उसकी विविध और जीवंत परंपराओं में बसती है—और भगोरिया उन परंपराओं की धड़कन है, खुली, रंगीन और आत्मीय।