डॉ. जितेंद्र सिंह ने ‘रुमेटोलॉजी एसेंशियल्स’ पुस्तक का किया विमोचन, क्लिनिकल जजमेंट पर जोर
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डॉ. जितेंद्र सिंह ने बीमारी की शुरुआती पहचान और सही समय पर उपचार पर जोर दिया।
‘रुमेटोलॉजी एसेंशियल्स’ डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के लिए उपयोगी क्लिनिकल मार्गदर्शन प्रदान करती है।
अनावश्यक जांचों से बचने और क्लिनिकल जजमेंट को मजबूत करने की जरूरत बताई गई।
New Delhi / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने मरीज-केंद्रित चिकित्सा व्यवस्था के लिए बीमारी की शुरुआती पहचान, समय पर उपचार और अनावश्यक मेडिकल टेस्ट से बचने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा में तकनीक के साथ-साथ चिकित्सकीय अनुभव और क्लिनिकल जजमेंट की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह बात ‘रुमेटोलॉजी एसेंशियल्स: ए न्यू फ्रंटियर फॉर एस्पायरिंग क्लिनिशियंस’ पुस्तक के विमोचन के अवसर पर कही। पुस्तक को प्रसिद्ध रुमैटोलॉजिस्ट प्रोफेसर आनंद एन. मालवीय और डॉ. प्रशांत कौशिक ने लिखा है। कार्यक्रम में एम्स के रुमेटोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. उमा कुमार, डॉ. शंकर सुब्रमण्यम समेत चिकित्सा क्षेत्र के कई वरिष्ठ विशेषज्ञ मौजूद रहे। पुस्तक की प्रस्तावना डॉ. विनोद के. पॉल ने लिखी है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मरीजों के बेहतर इलाज के लिए तीन बातों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है—बीमारी की जल्द पहचान, अनावश्यक जांचों से बचाव और जरूरत पड़ने पर सही विशेषज्ञ के पास समय पर रेफरल। उनके मुताबिक इससे अनावश्यक दवाओं और जांचों को कम करने के साथ-साथ बीमारी की पहचान में होने वाली देरी को भी रोका जा सकता है।
उन्होंने प्रोफेसर आनंद एन. मालवीय के योगदान की सराहना करते हुए उन्हें ‘शिक्षकों के शिक्षक’ बताया। डॉ. सिंह ने कहा कि प्रोफेसर मालवीय का योगदान केवल विद्यार्थियों को पढ़ाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने देशभर में रुमेटोलॉजी को आगे बढ़ाने वाली चिकित्सकों और शिक्षकों की कई पीढ़ियां तैयार कीं। उनके प्रयासों से भारत में रुमेटोलॉजी को संस्थागत पहचान और प्रशिक्षण का मजबूत आधार मिला।
पुस्तक के क्लिनिकल फ्रेमवर्क का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि इसमें इन्फ्लामेटरी रुमैटिक बीमारियों, मैकेनिकल-स्ट्रक्चरल विकारों और नोसिप्लास्टिक पेन सिंड्रोम के बीच अंतर करने का व्यावहारिक तरीका प्रस्तुत किया गया है। इससे चिकित्सकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किन मरीजों को विशेषज्ञ रुमेटोलॉजिकल देखभाल की आवश्यकता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मेडिकल जांचों का इस्तेमाल चिकित्सकीय सोच को मजबूत करने के लिए होना चाहिए, न कि क्लिनिकल जजमेंट के स्थान पर। उन्होंने इम्यूनोलॉजिकल टेस्ट, एमआरआई और अन्य आधुनिक जांचों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच उनके उचित और जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने मस्कुलोस्केलेटल विकारों के व्यापक प्रभावों का भी उल्लेख किया। लंबे समय तक या अनुचित तरीके से दर्द निवारक दवाओं के इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में सही निदान और समय पर विशेषज्ञ तक पहुंच मरीज की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
डॉ. सिंह ने रुमेटोलॉजी में डीएम, डीएनबी और फेलोशिप कार्यक्रमों से संबंधित जानकारी को पुस्तक में शामिल किए जाने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक मेडिकल छात्रों, युवा डॉक्टरों, प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों, जनरल फिजिशियन और आपातकालीन चिकित्सा से जुड़े डॉक्टरों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
उन्होंने भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण वैज्ञानिक और मेडिकल साहित्य उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि भाषा शिक्षा के रास्ते में बाधा नहीं बननी चाहिए और इसके लिए पर्याप्त पेशेवर साहित्य तैयार किया जाना जरूरी है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रोफेसर मालवीय और डॉ. कौशिक को पुस्तक के प्रकाशन पर बधाई दी। उन्होंने उम्मीद जताई कि ‘रुमेटोलॉजी एसेंशियल्स’ चिकित्सकों और उभरते विशेषज्ञों के व्यापक वर्ग तक पहुंचेगी तथा मरीजों को केंद्र में रखकर अधिक जिम्मेदार, नैतिक और प्रभावी चिकित्सा अभ्यास को बढ़ावा देने में योगदान देगी।