National Librarian’s Day 2026: रंगनाथन की विरासत और पुस्तकालयों का महत्व
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National Librarian’s Day 2026
12 अगस्त को राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस मनाया जाता है।
प्रो. एस. आर. रंगनाथन की 134वीं जयंती पर विशेष आयोजन।
2026 की थीम पुस्तकालयों की बदलती भूमिका पर केंद्रित है।
New Delhi / देशभर में आज, 12 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन भारत में पुस्तकालय विज्ञान के जनक माने जाने वाले पद्मश्री प्रो. एस. आर. रंगनाथन की 134वीं जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। इस वर्ष राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस का विषय “Libraries: Connecting People, Preserving Knowledge, Empowering the Future” रखा गया है। यह थीम पुस्तकालयों की बदलती भूमिका और ज्ञान के संरक्षण में उनके योगदान को रेखांकित करती है।
राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस केवल पुस्तकालयाध्यक्षों के सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि ज्ञान, शिक्षा, शोध और आजीवन सीखने की संस्कृति को समर्पित दिवस है। पुस्तकालय किसी समाज की सामूहिक स्मृति होते हैं, जहां पुस्तकों, दस्तावेजों और बौद्धिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
भारत में पुस्तकालयों की परंपरा आधुनिक दौर से काफी पुरानी है। प्राचीन भारत में ज्ञान के संरक्षण और प्रसार की जिम्मेदारी मौखिक परंपराओं, गुरुकुलों, मठों और शिक्षा केंद्रों के माध्यम से निभाई जाती थी। नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्र भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा के उदाहरण हैं। समय के साथ ताड़पत्र और हस्तलिखित पांडुलिपियों से मुद्रित पुस्तकों और फिर डिजिटल संसाधनों तक पुस्तकालयों का स्वरूप बदलता गया।
आधुनिक भारतीय पुस्तकालय इतिहास में कोलकाता के National Library का विशेष स्थान है। इसकी यात्रा 21 मार्च 1836 को स्थापित Calcutta Public Library से शुरू हुई। 1903 में इसका Imperial Secretariat Library के साथ विलय हुआ और Imperial Library अस्तित्व में आई। स्वतंत्रता के बाद 1948 में इसका नाम National Library किया गया और 1 फरवरी 1953 को इसे जनता के लिए खोला गया।
रंगनाथन ने बदली पुस्तकालय विज्ञान की सोच
डॉ. एस. आर. रंगनाथन का जन्म 1892 में तमिलनाडु के शियाली में हुआ था। गणित की शिक्षा प्राप्त करने और शिक्षक के रूप में काम करने के बाद उनका जीवन पुस्तकालय विज्ञान की दिशा में आगे बढ़ा। 1924 में उन्हें मद्रास विश्वविद्यालय का पुस्तकालयाध्यक्ष नियुक्त किया गया। इसके बाद उन्होंने भारत में पुस्तकालय शिक्षा, वर्गीकरण और सूचना संगठन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1931 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Five Laws of Library Science ने पुस्तकालयों की भूमिका को समझने का नया दृष्टिकोण दिया। उनके पांच सिद्धांतों में पुस्तकें उपयोग के लिए हैं, हर पाठक को उसकी पुस्तक मिले, हर पुस्तक का अपना पाठक है, पाठक का समय बचाया जाए और पुस्तकालय एक विकसित होती संस्था है, शामिल हैं।
आज डिजिटल युग में भी ये सिद्धांत प्रासंगिक दिखाई देते हैं। National Digital Library of India जैसी पहलें ज्ञान को डिजिटल माध्यम से व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचा रही हैं। आधुनिक पुस्तकालयों में ई-बुक, डिजिटल अभिलेख, शोध डेटाबेस और ऑनलाइन कैटलॉग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
युवाओं के लिए पुस्तकालय का महत्व
आज युवाओं के सामने जानकारी की कमी नहीं, बल्कि विश्वसनीय जानकारी पहचानने की चुनौती है। इंटरनेट पर उपलब्ध हर सूचना ज्ञान नहीं होती। ऐसे में पुस्तकालय पाठकों को प्रमाणिक स्रोतों तक पहुंचने और सूचना को समझने में मदद कर सकते हैं।
विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय अध्ययन का वातावरण उपलब्ध कराते हैं। शोधकर्ताओं के लिए वे संदर्भ सामग्री और अभिलेखों का स्रोत हैं, जबकि बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने में भी उनकी अहम भूमिका है। पुस्तकें युवाओं में तर्क, संवेदनशीलता, जिज्ञासा और विचार करने की क्षमता विकसित कर सकती हैं।
राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस का संदेश स्पष्ट है कि पुस्तकालय केवल किताबों की अलमारियां नहीं, बल्कि ज्ञान, संवाद और सामाजिक चेतना के केंद्र हैं। रंगनाथन की विरासत आज भी यह याद दिलाती है कि पुस्तकालय तभी जीवंत है, जब वह पाठक की जरूरत पूरी करे और बदलते समय के साथ लगातार विकसित होता रहे।
आज जब दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, तब पुस्तकालय का भविष्य प्रिंट और तकनीक के बीच संतुलन बनाने में है। किताब, डिजिटल ज्ञान और प्रशिक्षित पुस्तकालयाध्यक्ष, मिलकर आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक विश्वसनीय और समावेशी ज्ञान व्यवस्था तैयार कर सकते हैं। यही राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस की सबसे बड़ी सार्थकता है।