Maharashtra Passive Euthanasia Rule: निजी अस्पतालों को मिला नया निर्देश

Fri 17-Jul-2026,05:35 PM IST +05:30

ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |

Follow Us

Maharashtra Passive Euthanasia Rule: निजी अस्पतालों को मिला नया निर्देश Maharashtra Passive Euthanasia Rule
  • महाराष्ट्र में निजी अस्पतालों को विशेष मेडिकल पैनल बनाने के निर्देश।

  • पैसिव यूथेनेशिया और लिविंग विल प्रक्रिया को मिलेगा संस्थागत समर्थन।

  • हरीश राणा केस के बाद सम्मानजनक मृत्यु के अधिकार को मिली नई मजबूती।

Maharashtra / Mumbai :

Mumbai / क्या किसी व्यक्ति को ऐसी असाध्य बीमारी की स्थिति में, जहां स्वस्थ होने की कोई संभावना न बची हो, कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणालियों के सहारे जीवित रखने के बजाय सम्मानपूर्वक विदा होने का अधिकार होना चाहिए? इसी संवेदनशील और महत्वपूर्ण प्रश्न को लेकर महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐतिहासिक पहल की है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए राज्य सरकार ने निजी अस्पतालों को भी ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) और ‘लिविंग विल’ (Living Will) से जुड़े मामलों के लिए विशेष चिकित्सा पैनल गठित करने का निर्देश दिया है।

सरकार के इस फैसले का उद्देश्य उन मरीजों को कानूनी और मानवीय राहत उपलब्ध कराना है, जो लंबे समय से ऐसी गंभीर चिकित्सा स्थिति में हैं जहां उनके स्वस्थ होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है। नए निर्देशों के तहत अब निजी अस्पताल भी ऐसे मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए निर्णय ले सकेंगे।

यह फैसला 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हरीश राणा बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के बाद सामने आया है। हरीश राणा, जो पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक के छात्र थे, वर्ष 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे। दुर्घटना में उनके सिर में गंभीर चोट लगी, जिसके बाद वे लगभग 13 वर्षों तक वेजिटेटिव स्टेट यानी कोमा जैसी स्थिति में रहे।

लंबे समय तक जीवन रक्षक प्रणालियों पर निर्भर रहने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अदालत ने एम्स, नई दिल्ली के चिकित्सकीय मूल्यांकन और उपलब्ध मेडिकल तथ्यों के आधार पर उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम, कृत्रिम भोजन और पानी की व्यवस्था हटाने की अनुमति प्रदान की। इसके बाद हरीश राणा का निधन हो गया। इस फैसले के साथ वे देश के पहले व्यक्ति बने जिन्हें न्यायालय की अनुमति से पैसिव यूथेनेशिया प्रदान किया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ किसी मरीज की जान लेना नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति में कृत्रिम चिकित्सा सहायता हटाना है जब मरीज के स्वस्थ होने की कोई संभावना न हो और वह केवल मशीनों के सहारे जीवित हो। इसके विपरीत, मरीज को प्राकृतिक रूप से मृत्यु प्राप्त करने की अनुमति दी जाती है।

वहीं लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज होता है, जिसमें कोई स्वस्थ व्यक्ति पहले से यह घोषित कर सकता है कि भविष्य में यदि वह असाध्य अवस्था में पहुंच जाए, तो उसे कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणालियों के सहारे अनावश्यक रूप से जीवित न रखा जाए।

महाराष्ट्र सरकार का यह कदम स्वास्थ्य सेवाओं और मरीजों के अधिकारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गंभीर रूप से बीमार मरीजों की गरिमा, स्वायत्तता और मानवीय अधिकारों को अधिक मजबूती मिलेगी। साथ ही, यह निर्णय देश में जीवन और मृत्यु से जुड़े नैतिक, कानूनी और चिकित्सकीय विमर्श को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।