राष्ट्रपति भवन में पूर्वोत्तर कारीगरों की मुलाकात: द्रौपदी मुर्मु ने की सांस्कृतिक विरासत की सराहना
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Delhi News
राष्ट्रपति भवन में कारीगरों की विशेष मुलाकात.
पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक कला का प्रदर्शन.
आत्मनिर्भर भारत में हस्तशिल्प की अहम भूमिका.
Delhi / 19 मई 2026 को राष्ट्रपति भवन में एक भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कार्यक्रम देखने को मिला, जब पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के कारीगरों और बुनकरों के एक समूह ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात की। यह मुलाकात केवल एक औपचारिक संवाद नहीं थी, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और हस्तशिल्प परंपराओं का एक जीवंत प्रदर्शन भी थी।
इस अवसर पर कारीगरों ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित ‘एट होम’ रिसेप्शन के लिए निमंत्रण किट तैयार करने के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि किस तरह सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी कला और कौशल के माध्यम से भारत की विविधता को प्रस्तुत किया। इस पहल ने न केवल उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच दिया, बल्कि उन्हें गर्व और आत्मविश्वास भी प्रदान किया।
पूर्वोत्तर राज्यों के कारीगरों ने अपने-अपने क्षेत्रों की पारंपरिक कला का प्रदर्शन किया। नागालैंड के कारीगरों ने केले के रेशे और बांस से सुंदर टोकरियां तैयार कीं। असम के बुनकरों ने अपनी प्रसिद्ध शॉल बनाई, जो उनकी बुनाई कला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं। मणिपुर के कारीगरों ने काली मिट्टी के पारंपरिक बर्तन बनाए, जबकि सिक्किम के कारीगरों ने प्राकृतिक रेशों से आकर्षक उत्पाद तैयार किए। इन सभी वस्तुओं में स्थानीय संस्कृति और परंपरा की गहरी झलक दिखाई दी।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस अवसर पर कारीगरों से बातचीत करते हुए पूर्वोत्तर भारत की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक समृद्धि की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र देश की जीवंत विरासत का प्रतीक है, जहां परंपरा और प्रकृति दोनों का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
उन्होंने कारीगरों और बुनकरों के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी कला न केवल सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखती है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूत करती है। राष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि इन पारंपरिक कलाओं को संरक्षित करना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार और समाज दोनों को मिलकर कारीगरों को अधिक अवसर देने चाहिए, ताकि उनकी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल सके। यह मुलाकात न केवल सम्मान का प्रतीक थी, बल्कि भारत की विविधता में एकता को भी दर्शाती है।