बिहार में कांग्रेस दही-चूड़ा भोज से सियासी तूफान

Tue 13-Jan-2026,02:06 PM IST +05:30

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बिहार में कांग्रेस दही-चूड़ा भोज से सियासी तूफान Bihar-Congress-Dahi-Chura-Bhoj-Controversy
Bihar / Patna :

Bihar/ पटना के सदाकत आश्रम में मकर संक्रांति से ठीक पहले कांग्रेस द्वारा आयोजित पारंपरिक दही-चूड़ा भोज ने बिहार की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया। कांग्रेस सेवा दल के प्रदेश अध्यक्ष संजय यादव की अगुवाई में हुए इस आयोजन में पार्टी के सभी छह विधायक नदारद रहे, जबकि महागठबंधन के भी कोई बड़े नेता कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। आयोजकों ने इसे कार्यकर्ताओं के लिए सीमित कार्यक्रम बताया, लेकिन विधायकों की गैरमौजूदगी ने सियासी हलकों में चर्चाओं को तेज कर दिया।

इस आयोजन के बाद एनडीए खेमे ने कांग्रेस पर तीखे हमले शुरू कर दिए। जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि भोज में “दही फट गया और चूड़ा बासी हो गया” क्योंकि एक भी विधायक नहीं पहुंचा। उन्होंने दावा किया कि खरमास खत्म होते ही कांग्रेस में बड़ी टूट देखने को मिलेगी और विधायक एनडीए की ओर रुख करेंगे।
एलजेपी (रामविलास) के नेता और मंत्री संजय सिंह ने भी यही दावा दोहराया कि कांग्रेस के सभी छह विधायक जल्द ही एनडीए में शामिल हो सकते हैं। वहीं, भाजपा के कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने यह कहकर हलचल बढ़ा दी कि राजद के कुछ विधायक भी उनके संपर्क में हैं।

कांग्रेस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पलटवार किया। बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि मकर संक्रांति सद्भाव और नई शुरुआत का पर्व है, इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने एनडीए नेताओं पर तंज कसते हुए कहा कि राजनीति में इस तरह की अफवाहें आम हैं—“जो बोला जाता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह बताया नहीं जाता।” उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस के सभी छह विधायक एकजुट हैं और पार्टी में किसी तरह की टूट की बात निराधार है।

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महागठबंधन को करारी हार मिली थी। राजद को 25 सीटें और कांग्रेस को मात्र छह सीटें मिलीं, जबकि एनडीए ने 202 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया। चुनावी नतीजों के बाद से ही कांग्रेस में असंतोष और संभावित टूट की चर्चाएं चल रही हैं। ऐसे में दही-चूड़ा भोज में विधायकों की अनुपस्थिति ने अटकलों को और हवा दे दी है।

फिलहाल यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह महज राजनीतिक बयानबाजी और मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति है, या वाकई बिहार की राजनीति में कोई बड़ा “खेला” होने वाला है। इसका जवाब आने वाले दिनों में साफ होगा।