नीली क्रांति को नई दिशा: मत्स्य पालन में स्वदेशी प्रजातियों पर सरकार का जोर
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स्वदेशी मछली प्रजातियों को बढ़ावा देकर सरकार मत्स्य पालन को टिकाऊ, विविध और पर्यावरण-अनुकूल बनाने पर जोर दे रही है।
पीएमएमएसवाई और आईसीएआर के माध्यम से बीज उत्पादन, प्रशिक्षण और आनुवंशिक सुधार को मजबूती मिल रही है।
उत्पादन-प्रसंस्करण क्लस्टरों से ग्रामीण रोजगार, आय वृद्धि और जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
दिल्ली/ भारत में मत्स्य पालन को अधिक टिकाऊ, समावेशी और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने स्वदेशी मछली प्रजातियों को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया है। मत्स्य पालन विभाग ने नीली क्रांति के अंतर्गत देशी जलीय प्रजातियों के संरक्षण, उत्पादन और व्यावसायिक उपयोग को प्राथमिकता दी है। यह पहल खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका, जैव विविधता संरक्षण और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को सशक्त बनाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
भारत का जलीय पारिस्थितिक तंत्र हिमालयी नदियों से लेकर हिंद महासागर के विस्तृत तटीय जल तक फैला हुआ है, जिसमें स्वदेशी मछली और शंख प्रजातियों की अत्यंत समृद्ध विविधता पाई जाती है। ये प्रजातियां न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान और खाद्य परंपराओं का भी अभिन्न हिस्सा हैं। मत्स्य पालन विभाग ने नीली क्रांति के अंतर्गत स्वदेशी प्रजातियों के संवर्धन को रणनीतिक प्राथमिकता बनाकर इस प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में ठोस पहल की है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR-NBFGR) के अनुसार देश में 2,800 से अधिक स्वदेशी मछली और शंख प्रजातियां चिन्हित की गई हैं, जिनमें 917 मीठे पानी, 394 खारे पानी और 1,548 समुद्री प्रजातियां शामिल हैं। इसके बावजूद, वर्तमान में मत्स्य उत्पादन कुछ सीमित प्रजातियों पर निर्भर है। मीठे पानी में रोहू, कतला और मृगाल का प्रभुत्व है, जबकि खारे पानी में विदेशी झींगा प्रजाति पेनायस वन्नामेई का वर्चस्व देखा जाता है।
सरकार का मानना है कि सीमित प्रजातियों पर निर्भरता से जैव विविधता को खतरा, रोगों का जोखिम और पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ सकता है। इसी कारण स्वदेशी प्रजातियों के विविधीकरण को आवश्यक माना गया है। आर्थिक और क्षेत्रीय महत्व के आधार पर फ्रिंज्ड-लिप्ड कार्प, ऑलिव बार्ब, पेंग्बा, मुर्रेल, पाब्दा, सिंघी, एशियन सीबास, पर्लस्पॉट, पोम्पानो, मड क्रैब और पेनायस इंडिकस जैसी प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई है।
इन प्रजातियों की विशेषता यह है कि इनके लिए प्रजनन, बीज उत्पादन और पालन-पोषण की तकनीकें पहले से विकसित हैं। स्थानीय बाजारों में इनकी मांग अधिक है, जिससे मछुआरों और किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है। साथ ही, ये प्रजातियां स्थानीय समुदायों की खाद्य सुरक्षा और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
हालांकि, स्वदेशी प्रजातियों को अपनाने में जागरूकता और तकनीकी ज्ञान की कमी एक बड़ी चुनौती रही है। इस अंतर को पाटने के लिए मत्स्य पालन विभाग प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PMMKSY) और मत्स्य एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (FIDF) के माध्यम से प्रशिक्षण, बीज आपूर्ति और अवसंरचना विकास पर जोर दे रहा है।
PMMSY के तहत जलीय कृषि उत्पादकता बढ़ाने, प्रजाति विविधीकरण और आनुवंशिक सुधार जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ICAR के सहयोग से रोहू, कतला, मुर्रेल, पेनायस इंडिकस और इंडियन पोम्पानो जैसी प्रजातियों के लिए आनुवंशिक सुधार कार्यक्रम भी शुरू किए गए हैं। इसके अलावा, भुवनेश्वर और मंडपम में नाभिकीय प्रजनन केंद्रों की स्थापना को मंजूरी दी गई है।
सरकार ने क्षेत्रीय महत्व के आधार पर 34 स्वदेशी प्रजाति उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टर भी अधिसूचित किए हैं। इनमें ओडिशा का स्कैम्पी क्लस्टर, तेलंगाना का मुर्रेल क्लस्टर, त्रिपुरा का पाब्दा क्लस्टर, मणिपुर का पेंग्बा क्लस्टर, केरल का पर्ल स्पॉट क्लस्टर और लद्दाख व जम्मू-कश्मीर के ट्राउट क्लस्टर शामिल हैं। इन क्लस्टरों का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार सृजन करना है।
अंतर्देशीय और जलीय कृषि भारत के कुल मछली उत्पादन का 75 प्रतिशत से अधिक योगदान करती है, जो इस क्षेत्र की आर्थिक क्षमता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वदेशी प्रजातियों को बढ़ावा देकर भारत मत्स्य पालन में अधिक संतुलित, पर्यावरण-अनुकूल और दीर्घकालिक विकास मॉडल अपना सकता है। नीली क्रांति के तहत यह पहल भारत को वैश्विक मत्स्य अर्थव्यवस्था में मजबूत और टिकाऊ भूमिका निभाने में सहायक सिद्ध होगी।