ओडिशा में सिजिमली पहाड़ पर खनन विवाद, आदिवासियों का विरोध तेज
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सरकार परियोजना को विकास और रोजगार से जोड़ रही है, जबकि आदिवासी समुदाय अपनी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए आंदोलन जारी रखे हुए है।
ओडिशा के सिजिमली पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन को लेकर आदिवासियों का विरोध तेज, जमीन अधिग्रहण और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए।
Odisha/ ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी जिलों में स्थित सिजिमली पहाड़ियों में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ‘ओडिशा का न्यूज़ीलैंड’ कहे जाने वाले इस क्षेत्र में आदिवासी समुदाय ने अपनी जमीन, आजीविका और पर्यावरण को बचाने के लिए विरोध तेज कर दिया है। इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है और सरकार पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, सिजिमली पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन के लिए जमीन एक निजी कंपनी वेदांता समूह को आवंटित की गई है। स्थानीय आदिवासी समुदाय का आरोप है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही और उनकी सहमति के बिना जमीन का हस्तांतरण किया गया।
आदिवासियों का कहना है कि प्रशासन द्वारा उन्हें जमीन छोड़ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। हालांकि प्रशासन इन आरोपों से इनकार करता है और दावा करता है कि सभी प्रक्रियाएं नियमों के तहत की गई हैं।
यह क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, सिजिमली की पहाड़ियां स्पंज की तरह काम करती हैं, जहां से कई जलधाराएं निकलती हैं। ये जलधाराएं आगे चलकर नागावली और वंशधारा नदियों में मिलती हैं, जो ओडिशा और आंध्र प्रदेश के कई इलाकों के लिए जीवनरेखा हैं।
खनन शुरू होने की स्थिति में इन जल स्रोतों और नदियों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे कृषि और पेयजल संकट की आशंका बढ़ सकती है। यही कारण है कि स्थानीय लोग इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। विपक्षी दल सरकार पर आदिवासी विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि सरकार विकास और रोजगार के अवसरों का हवाला दे रही है।
इस बीच, आदिवासी समुदाय ने शांतिपूर्ण विरोध जारी रखने का फैसला किया है और अपनी जमीन व प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए संघर्ष तेज करने की बात कही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परियोजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि इसमें पर्यावरण, आजीविका और विकास जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं।